मंगलवार, 29 नवंबर 2011

जख्म

जख्मों  के  निशान गहरे हैं अभी दिखा नहीं सकता
लगाए किसी अपने ने ही हैं बता नहीं सकता
दुख होगा तुम्हे जानकर की जख्म अभी हरे हैं
मगर हरियाली में भी हैं रास्ता मैं बता नहीं  सकता

सोमवार, 21 नवंबर 2011

बाजीगरी

तुम्हे अदावत रुलाती हैं
हमें मुह्हबत सताती हैं
तुम्हारे घर मुफलिसी का बसेरा हैं
अक्सर हमारे घर अमरी आती हैं
तुम बिक गए हो कारोबारे-इ-इश्क में
हमे इश्क की कारीगरी आती हैं
शक हो तो कभी आजमा लेना
हमे ज़िन्दगी की बाजीगरी आती हैं


शनिवार, 12 नवंबर 2011

थी और नहीं भी

तेरे आगोश में नींद आती भी थी
और नहीं भी
तू मुझको कई बार रुलाती भी थी
और नहीं भी
ये तो सच हैं की मैं उदास हूँ तुझसे मगर
तेरे बगैर ज़िन्दगी जी भी जाती भी थी
 और नहीं भी  

लड़ती रही एक लौ

लड़ती रही एक लौ अँधेरे से ये सोच कर की मैं सही हूँ रह रह कर वो देती एक चुनौती और बीच बीच में वो खिड़की के बहार देखती की आ जाये कोई मसीहा हौसल...