मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

डर

इस कदर परेशां रहने लगा हूँ
भीड़ मैं तनहा रहने लगा हूँ
करता था कभी उगते सूरज को सलाम
अब तो डूबते को भी करने लगा हूँ
डरता था अक्सर मौत से कभी
आज ज़िन्दगी से भी डरने लगा हूँ

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

लड़ो काटो मरो

लड़ो काटो मरो
एक दूसरे को घाव दो
चिथड़े ऊड़ा दो जिस्म के 
रूह को जिस्म से जुदा कर दो
मुह्हबत तुम्हे रास नहीं आयगी 
लोरी से भी तुम्हे नींद नहीं आयगी 
जिओ ऐसे ही जीते आये हो
लड़ो काटो मरो....
सफ़ेद रंग तुम्हे कभी शांति नहीं देगा
हरा रंग कभी हरियाली नहीं लायेगा
सिर्फ लाल रंग समझते हो तुम
खून की होली से सबको नहला दो
जस्न मनाओ अपने उन्माद में
की तुम आजाद हो बरसों से
लड़ो काटो मरो.......









लड़ती रही एक लौ

लड़ती रही एक लौ अँधेरे से ये सोच कर की मैं सही हूँ रह रह कर वो देती एक चुनौती और बीच बीच में वो खिड़की के बहार देखती की आ जाये कोई मसीहा हौसल...