गुरुवार, 26 मई 2011

कहाँ गया उसे ढूंढो ....एक सत्य घटना

सर पर चोट लगने की वजह से मेरे पिताजी की याददाश्त   कमज़ोर हो गयी थी डॉक्टर की सलाह से उन्हें दिल्ली लाकर ऑपरेशन करने का विचार था पर पिताजी दिल्ली आने को तैयार नहीं थे बार बार कह रहे थे की कहीं नहीं जाना हैं मुझे मैं अपने बाप के घर को छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा जो इलाज करवाना हैं यहीं करवाओ माँ के बहुत समझाने के बाद वो एक हफ्ते के लिए दिल्ली आने को तैयार हो गयी और कहा की अगर वहां मन नहीं लगा तो दो दिन मैं ही चला आऊंगा उनकी इस बच्चे जैसी बातो को सुनकर सब  हंश्ने लगे . अगले दिन तयशुदा वक़्त पर हम दिल्ली चलने को तैयार हुए घर से निकलते ही पिताजी ने कहा  अपनी वो काली वाली टी-शर्ट दे पहनने को ये पुरानी शर्ट पहन कर मैं नहीं जाऊंगा मैंने गुस्से मैं देखा मगर उनको कोई फर्क नहीं पड़ा बोले सोच ले बाप चाहिए की शर्ट माँ ने बीच  में ही कहाँ की ठीक हैं दे दे इन्हें वो वाली शर्ट इनका भी नौटंकी ना   शर्ट पहनती हे उनका चेहरा ख़ुशी से खिल गया जैसे कोई जंग जीत ली हो शर्ट पहनते ही वो एक नवजवान की तरह लगने लगे थे.

बिलासपुर से दिल्ली तक पहुचते पहुचते उनका बुखार कुछ कम ज्यादा होता रहा मगर उन्होंने ज्यादा बात नहीं की बस बीच बीच मैं उठकर स्टेशन आने पर उनका नाम पूछते जातें थे सुबह ७ बजे ट्रेन स्टेशन पर थी  पिताजी  की तबियत वैसे की वैसे थी ऑटो लेकर हम घर पहुचे पिताजी ने कहा की मैं थक गया हूँ अभी आराम करूंगा कोई उठाना मत हम सब भी थके हुए थे तो आराम करने चले गए २ घंटे बाद जब सबने आँख खोली  तो देखा पिताजी गायब हैं , हमने यहाँ वहां देखा मगर वो नहीं दिखे  फिर छोटे भाई ने कहा अरे यार उनको तो रोज पीने की आदत हैं इसीलिए निकल गए  होंगे मैंने कहा सुबह सुबह हद करतें हैं यार अभी २ घंटे पहले ही तो आए  हैं सब ने कहा कोई नहीं आ जाएँगे जैसे जैसे समय बीतता गया उनका कोई पता नहीं चला माँ ने कहा शायद घर वापस चले गए होंगे वैसे भी बोल रहे थे की नहीं रुकुंगा लेकिन बोलकर तो जाना था ऐसे कैसे जा सकतें हैं शाम को घर फ़ोन लगा दिया गया सब परेशान हो रहे थे कोई ये कह रहा था की उनको ऐसे हालत में अकेला नहीं  छोड़ना था , लेकिन छोड़ने  की बात तो तब थी की जब हमें पता होता की वो भागने वाले हैं वो तो बिना कुछ बोले ही चले गए थे दो दिन हो गए उनका कोई पता नहीं चला अब हर तरफ खबर फैला दी गयी घर बाहर हर कोई परेशान और अंत मैं हार कर हम लोग थाने चले गए गुमशुदा की रिपोर्ट लिखवाने पहली बार मैं थाने जा रहा था वो माहौल मेरे लिए बिलकुल नया था हमने थानेदार से कहा एक ( F.I.R.) लिखवानी हैं गुमशुदा की उसने उपर से नीचे तक मुझे देखा और कहा कौन लापता हैं मैंने कहा मेरे पापा २  दिन से घर नहीं आए हैं उन्ही  की रिपोर्ट लिखवानी हैं हंसते हुए उसने कहा पकड़ कर क्यों नहीं रखतें हो अपने माँ बाप को अब कितने लोग यही केस लेकर रोज २ आ जातें हैं जाओ एक कागज मैं अपनी शिकायत लिखकर दे दो हम सील लगाकर दे देंगे मैंने कहाँ इनके बारे मैं जानकारी कब तक मिल जाएगी उसने कहा ज्यादा  सवाल न कर छोरे शिकायत लिख दी हैं न अपनी जब मिलेंगे तो हम खुद संपर्क केर लेंगे धन्यवाद कहने के सिवा हमारे पास और कुछ नहीं था.

घर आकर हम सब दोस्त भी अलग अलग दिशाओं में निकल पड़े उन्हें खोजने के लिए साथ मैं उनकी फोटो लेकर दिल्ली ( NCR ) में उनकी खोज जारी  रखी जब भी समय मिलता हम आस पास के इलाके में जाकर उनका पता करतें हर स्टेशन बस स्टैंड पर उनकी फोटो लगा रखी थी हमने एक एक दिन काटना हमारे लिए मुश्किल होता जा रहा था इधर माँ का हाल भी रो रो कर बुरा हो रहा था हर बार थाने जाकर अपना सा मुँह  लेकर आ जाते थे  अब तो थाने वाले भी फटकार लगाने लगे थे की सारी फोर्सं भेज दे तेरे बापू को खोजने में जब मिलेंगे तो बता देंगे एक दो बार तो ऐसे बातें बोली की मत पूछो एक ने कहा हाँ ज़रूर प्रोपर्टी का मामला होगा पता करना होगा की बाप जिंदा हैं की नहीं और अगर मर गया हैं तो हमसे प्रमाणपत्र चाहिए होगा येः बाप का प्यार नहीं प्रोपर्टी का मोह हैं ,मैंने भी चुटकी लेते हुए कहा मेरे बापू बेरोजगार थे और सारी  प्रोपर्टी शराब में उड़ा चुके हैं उनके नाम और माँ के सिवा हमारी कोई प्रोपर्टी नहीं हैं माफ़ किजियेगा सर आपको तकलीफ दी अब अपने बापू को खुद ही खोज लेंगे जवाब सुनकर उसने भी अपना मुँह फेर लिया अब तक हमें मालूम चल गया था की थाने वाले सिर्फ खानापूर्ति के लिए काम कर रहे हैं. हमने दुबारा थाने न जाने का फैसला कर लिया और अगले दिन से दुगनी तेजी से अपने पिता को ढूँढने में लग गए इस बार हमने समाचार पत्र में इश्तेहार निकला और मुख्या तौर पर हॉस्पिटल तथा वृधाश्रम में पढताल सुरु की एक बार तो हमे खबर मिली  की टगोर गार्डेन के पास एक ६० साल के आदमी की लाश मिली हैं जो की एक काली टी शर्ट पहने हुए था मैंने तुरंत अपने दोस्त को फ़ोन लगाया और उस हॉस्पिटल की तरफ निकल पड़े वहां पहुचते-पहुचते बहुत रात हो चुकी थी मुर्दा घर भी बंद हो चूका था बहुत मानाने पर उसने लाश दिखने की हामी भर दी लेकिन  उसने कहा की वो मुर्दा घर के अंदर नहीं जाएगा जैसे ही उसने दरवाजा खोला हमारा कलेजा मुँह में आ गया १०-१५ लाशे वहां रखी हुई थी. उसने कहा की सिनाक्थ करने के बाद मुझे बुला लेना  हम दोनों अंधरे में एक एक लाश को पहचानने की कोशिश कर रहे थे.

सब बुरे से बुरे हालत में थी मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे अंततः  एक भी लाश की सिनाक्थ नहीं हो सकी हम खुश थे की कम से कम इनमें तो वो नहीं थे मगर दुखी भी थे की उनका अभी तक कोई पता नहीं चला .उसके  कुछ दिन बाद हमने ( र.टी.इ ) फाइल किए मगर पिताजी का कहीं कोई पता नहीं चला येः विडम्बना हैं इस देश की .
यहाँ आम आदमी की सुरक्षा और जान की किसी को परवाह नहीं हैं यही हॉल अगर किसी मंत्री का होता तो सब की सब फोर्स  लग गयी होती और अब तक वो मिल भी गए  होते 

इस घटना को एक साल हो गए  हैं और अब तक कोई सुराग नहीं मिला हैं अब तो येः विश्वाश करना भी मुस्किल हो गया हैं की वो जिंदा भी हैं की नहीं इस घटना से माँ पूरी तरह टूट गयी हैं और उसने आश्रम जाने का फैसला कर लिया हैं अब वो किसी के साथ रहना नहीं चाहती भाई भी नौकरी के लिए दुसरे शहर चला गया हैं मैं भी किसी तरह अपनी ज़िन्दगी के दिन गिन रहा हूँ कभी कभी माँ से आश्रम में  मिलने चला जाता हूँ पिता की याद सबके जेहन से धुन्दली होती जा रही हैं और एक ही बात याद आती हैं पिताजी को लेकर की
" इतना रो चूका हूँ तुजे पाने की कोशिश मैं के अब अगर तू मिल भी जाए तो गम कम न होगा "
और अगर वो वापस आ भी गए तो क्या सब ठीक हो जाएगा..वो अकेले नहीं गए अपने साथ बहुत सारे सवालों के जवाब भी ले गहैं..इसी उम्मीद में की वो ज़रूर वापस आयेंगे अपने कुछ सवालो और हमारे कुछ जवाबो के साथ .........

शुक्रवार, 20 मई 2011

टूटा गुल्लक, बिखरा बचपन

"ले पढ़ बेहतरीन बुक है "मुझे आकाश ने मक्सिम गोर्की की मेरा बचपन देते हुए कहा.मैंने दो पन्ने पढ़े और उसे वापस देते हुए कहा मेरा भी एक बचपन था.सुन एक बिखरे बचपन की कहानी.वो दिन मेरे लिए लिए कुछ स्पेशल था.पिताजी ने एक मिटटी का गुल्लक मुझे ला कर दिया था.मुझे ये पता नहीं था की पिताजी करते क्या हैं और न ही कभी जानना चाहा.सुबह निकल जाते थे रात को आते थे और सब से पहले मुझे ही खोजते थे। "ये ले तेरा बैंक ,बैंक पता है ना हम सब जहाँ पैसे रखते हैं.उसकी सुरख्छा के लिए"मैं गुल्लक देख कर काफी खुश हुआ .ऐसा ही एक सुमित के पास भी था.जिसे वो पिग्गी बैंक कहता था.हर महीने उसका गुल्लक भर जाता था क्योंकि उसके पिताजी अमीर थे ऐसा माँ कहती थी .तब मैं अमीर को एक जाती या धर्म समझता था .खैर उस दिन के बाद गुल्लक मेरा सबसे प्यारा साथी हो गया मैंने सबसे पहले सुमित के घर जा कर उसे गुल्लक दिखाया."हे हे गधा खाली गुल्लक क्या दिखा रहा है.देख मेले पास तो इतने सारे भरे हुए गुल्लक हैं "सुमित ने मुझे चिढाते हुए कहा.तब मैंने भी ठान ली की एक महीने में अपना गुल्लक भर के उसे दिखाऊंगा |.

"बुआ पैसे दो ना मुझे गुल्लक भरनी है "मैंने प्यार से बुआ को कहा ."ये तुझे किसने ला कर दिया?" बुआ ने पूछा मैंने कहा पिताजी ने ."ओह तो अब इसे भरने के लिए पैसे कहाँ से लाएगा.जा अपने पिता जी से ही भरवा अब गुल्लक " बुआ ने पच्चीस पैसे देते हुए कहा। मैंने वो पच्चीस पैसे प्यार से गुल्लक में डाले और फिर उसे हिला कर पैसे की खनकने की आवाज़ सुनी.और फिर उस पर लिख दिया 'लवी का गुल्लक' वो एक ऐसा एहसास था जो मैं आज भी नहीं भूलता.वो पचीस पैसा मेरे पच्चीस लाख के पैकेज से ज्यादा कीमती था.उस दिन के बाद मुझे पैसे की खनक माँ की लोरियों से भी अच्छी लगने लगी.

"कितना जमा कर लिया लवी" पिता ने शाम को आते ही मुझसे पूछा ' पच्चीस पैसे बुआ ने दिए " मैंने कहा "ये ले एक रुपये मेरी तरफ से " पिता ने गुल्लक की और हाथ बढ़ाते हुए कहा " मैंने कहा नहीं मैं डालूँगा "|
"अच्छा तू ही डाल ले "पिता ने प्यार से सर सहलाते हुए कहा .तुझे पता है ये बहुत कीमती चीज है इसे ऐसे खुले में नहीं रखते जा ऊपर वाले कमरे में छुपा दे ".मैं दौड़कर उसे दादाजी की तस्वीर के पीछे रख दिया.लेकिन मेरा मन नहीं माना मैं कुछ देर बाद उसे फिर नीचे ले आया और उसे फिर हिला कर सिक्कों की आवाज़ सुनी जो की पहले से ज्यादा तेज़ थी.

स्कूल बैग में भी मैंने गुल्लक को डाला "ये क्या कर रहा है "माँ ने पूछा "ये मेरा नया दोस्त है मैं इसे अपने बाकि दोस्तों से स्कूल में मिलवाऊँगा.कुछ पैसे दो ना मम्मी मेरे गुल्लक के लिए " मैंने कहा." पच्चास पैसे तो तू रोज़ लेता ही है टाफी के लिए वही ले ले " मैंने वो पचास पैसे अपने गुल्लक में डाल दिए.

दिन कब बढ़ने लगे पता ही नहीं चला मेरा गुल्लक भी काफी भरी होने लगा | एक दिन स्कूल की परीक्षा आयी मुझे कुछ दिनों के लिए अपने गुल्लक से दूर जाना था ये सोच कर ही बड़ा अजीब लग रहा था मैंने अपने पिताजी से ये बात बताई तो उन्होंने कहा की हम लोग भी जब बाहर जातें हैं या कुछ दिन के लिए पैसे को कही  रहना हो तो उसे किसी बैंक मैं रख देतें हैं वहा पैसा सुरक्षित रहता हैं | पिताजी की बात पर मुझे पूरा विश्वाश था क्योंकि उस समय तक विश्वाश न करना क्या होता है मुझे पता नही था मैंने पूछा की पिताजी  मैं कैसे जमा कर सकता हूँ बैंक मैं पैसा वो बोले अभी इसको मरे पास रख दे परीक्षा के बाद तेरा भी खाता खुलवा देंगे मैं बड़ा खुश हुआ की अब मारा भी खाता होगा बैंक मे पिताजी ने कहा की ये ले मरे कमरे की चाभी और अपना गुल्लक वहां पर छुपा दे | 

मैं दौड़ता हुआ कमरे में गया और किताबो के पीछे उस गुल्लक को छुपा दिया फिर मैं चला आया परीक्षा की वजह से कुछ दिनों के लिए मेरा नाता उस गुल्लक से छूट गया लेकिन बहुत जल्द ही मेरी परीक्षाएं भी ख़तम हो गयी अब मुझे फिर से अपने गुल्लक का ख्याल आया उस दिन सुबह से ही पिताजी घर पर नहीं थे मेरे आँखें दरवाजे पर नज़र जमाये हुए थी की कब पिताजी आए और मैं कमरे मैं जाकर अपने गुल्लक को ले लूं .उस रात पिताजी शराब पीकर आए पहली बार मुझे समझ में आया की एक सामाजिक इंसान का शराब पीना कितनी बुरा हैं  क्योंकि जिस लहजे मैं वो बात कर रहे  थे ये मानना बड़ा मुस्किल था की ये वो ही मेरे पिता हैं जो सुबह मुझे ज्ञान की बातें सिखातें हैं खैर जैसे तैसे मैंने उनसे कमरे की चाभी ले और अपने गुल्लक को लेने चल पड़ा पर जैसे हे मैंने दरवाजा खोला मेरे पैरो तले की  ज़मीन खिसक  गयी मेरा गुल्लक फर्श पर टूटा पड़ा था |  

पहली बार मेरे आँखों से झर झर आँशु टपक रहे थे मैं रोता  हुआ अपने कमरे मैं गया और जाकर सो  गया अगले  दिन मुझे  उदास देखकर  माँ  ने पुछा क्या बात हैं मैंने सारी  घटना  उनको  बता  दी  सुनकर  माँ  ने कहा तू  इतनी  बड़ी  गलती  कैसे कर सकता हैं पहले  बताना  था न  तुझे  की तुने  गुल्लक वहां रखा  हैं रुक  मैं पूछती  हूँ | सामने  से पिताजी हँसतें  हुए आ  रहे  थे जैसे की कोई  शातिर बदमाश मुस्कुराता हुआ आता हैं  और आते ही  उन्होंने कहा की हाँ  कल  मैंने तेरा गुल्लक तोड़ दिया  करीब 40 रूपए  थे उसमें  जिसकी   मैंने शराब  पी ली  कोई  नहीं तेरे  लिए नया  गुल्लक ले लेंगे  रोता  क्यों  हैं.फिर रख देना मेरे  कमरे मैं इतना सुनते ही सब जोर जोर से हंश्ने लगे की और कहने लगे और  रख गुल्लक अपने बाप के पास उनकी हंशी जैसे मेरे लिए कटाक्ष से कम नहीं थी  मेरे जुबान  से एक शब्द  भी नहीं निकला  मैं समझ गया था की मेरा गुल्लक किसने  तोडा हैं कौन है वो  कोई  और नहीं मेरा अपना बाप हैं उस रात सिर्फ एक गुल्लक ही  नहीं टूटा था बल्कि  उसके  साथ  मेरा विश्वाश  और भरोसा  दोनों टूटा था | एक गुल्लक के टूटने का दर्द सिर्फ वो बच्चा ही समझ सकता हैं जिसने सपने में भी गुल्लक को अपने से दूर नही रखा और एक हवा के झोके के साथ वो सारे  सपने बिखर गए हो . इस घटना को आज पूरे २० साल हो गए हैं मगर आज भी उसको याद करने से दिल घबराता हैं | मेरे टूटे हुए गुल्लक के साथ साथ मेरा बचपन भी बिखर गया एक वो दिन था और एक आज का दिन हैं  तब से लाकर आज तक मैंने कभी गुल्लक नही रखा .....



मैंने उसूल निभाए हैं जज्बातों की जगह

मैंने उससे शादी का प्रस्ताव रखा , उसने तुरंत हाँ कर दिया फिर मैंने उससे कुंडली का मिलन किया हमारे सिर्फ १२ ही गुण मिल रहे थे , ये बात मैंने उसे बताई और कहा एक कुंडली की वजह से सपनो की मौत हो रही हैं उसने कुछ नहीं कहा फिर मैंने घरवालों से बात कही उनको सब मंज़ूर था कुंडली का दोष वो दूर करवाने के लिए तैयार थे मगर अंतरजातीय विवाह के खिलाफ थे l ये बात मैंने उसे भी बताई उसने कहा आप क्या सोचतें हैं ये बताओ l
मैंने कहा मुश्किल हैं घरवालों के खिलाफ जाना, कुछ देर खामोश रहने के बाद उसने कहा की हमारा रिश्ता अगर आगे नहीं बढ़ता तो कोई बात नहीं मगर आप मुझसे दूर मत जाना क्योंकि मैं आपसे प्यार करने लगी हूँ l
मैं स्तब्थ रह गया, मैंने कहा अभी हमे दो दिन ही हुए हैं मिले हुए और तुम्हे प्यार हो गया, उसने कहा इससे पहले कितने  ही लोग मिले हैं मुझसे मगर सब दोस्ती फिर प्यार और फिर शादी का ख्याल रखतें हैं मगर आपने पहले शादी का प्रस्ताव रखा, अच्छा लगा जानकर l
मैंने कहा अब शादी तो नहीं हो सकती अगर तुम नहीं चाहती तो हम बात करना छोड़ देतें हैं, नहीं तो बाद मे तुमको ही दिक्कत होगी l मुझे हालाकि तुमसे प्यार नहीं ,मगर फिर भी मैं तुमरा दिल नहीं तोडना चाहता हूँ जब तुम चाहो मुझे कह देना, मैं तुम्हारी ज़िन्दगी से चला जाऊंगा l कुछ ही दिनों  में हम अच्छे दोस्त हो गए रोज बातचीत का सिलसिला चलता रहा l एक दिन फिर उसने अचानक कहा अब भी तुमको मुझसे प्यार नहीं हुआ l
मैंने कहा मैं आज भी तुम्हारे जज्बातों की कद्र करता हूँ मगर मुझे ऐसा कोई अहसास नहीं हो रहा है, मुझसे बिछड़ने के बाद तुम्हे तकलीफ न हो इससे बेहतर है की हम मिलना छोड़ दे l
बार बार छोड़ने की धमकी क्यों देतें हो ऐसा कहकर वो चली गयी l मैं भी चला आया  |

कुछ दिन बाद उसका फ़ोन आया  " मुझे माफ़ कर दो मै ही पागल हूँ जो तुम्हे परेशान करती रहती हूँ एक ही सवाल पूछकर l मुझे पता है की तुम्हे मुझसे प्यार नहीं है पर एक बार झूठ ही कह दो ", फिर उसने कहा मेरी शादी तय हो गयी है l एक दो महीने मे मेरी शादी भी हो जाएगी एक आखरी बार आपका जवाब जानना है l

मैंने उसे शादी की बधाई देतें हुए कहा की जिससे तुम्हारी शादी होगी वो बहुत ही किस्मत का धनि होगा जो तुम्हारी जैसी लड़की उसे मिल रही    है l शादी से पहले वो मुझसे मिलना चाहती थी एक बार, मैंने हाँ कर दी अगले दिन हम मिले घंटों तक बात चली मैंने उससे पूछा लड़का देखने मे कैसा हैं उसने कहा मैंने उसे देखा नहीं हैं घर वालों ने बताया की देखने मे सुन्दर है मैंने कहा कुछ बातचीत तो हुई होगी उसने कहा घरवालों ने की हैं | उन्हें वो अच्छा लगा  मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा मैंने कहा बिना देखे और बात किए तुम कैसे हाँ कर सकती हो उसने कहा आपको तो देखा भी था और बात भी की थी क्या फायदा हुआ मेरे पास कोई शब्द ही नही थे मैंने उससे कहा आज के बाद हम कभी नहीं मिलेंगे हमारी कहानी बस यहीं तक थी  मैं नहीं चाहता की शादी के बाद मेरे नाम से कोई फसाद खड़ा हो ऐसा कहकर मैं चला गया , सुनने मे आया की कुछ ही दिनों मे उसकी शादी हो गयी मैं उसके लिए बहुत खुश था क्योंकि इतने दिनों मे वो मेरी बहुत अज़ीज़ दोस्त हो गयी थी |

इतने दिनों तक हम साथ मे थे मुझे कभी उसकी कमी नहीं खली लेकिन ये ख्याल आते ही अब शादी के बाद तो वो मुझसे बिलकुल ही नहीं मिलेगी मन अशांत सा हो गया अकेलापन मुझे सताने लगा हर पल उसी का ख्याल आने लगा जैसे मेरा दिल और दिमाग आपस मे लड़ने लगे . एक बाप बेटे की तरह और आज मेरा दिमाग फिर अपनी तर्कशक्ति पर फक्र मनाता हुआ दिल पर हंस रहा था | एक बार फिर जज्बातों  ने उसूलों के आगे घुटने टेक दिए हैं,  दिल सिर्फ ये कहता हुआ शांत हो गया की मैंने उसूल निभाए हैं जज्बातों की जगह  उससे मिलने से पहले मैंने कुछ उसूल बनाए थे जिसे मानना मेरे दिल को नितांत ज़रूरी था वो उसूल मेरे दिमाग का बनाया हुआ था  की  " मैं इकरार कैसे करता मैंने इजाजत ही नहीं दी थी दिल को प्यार करने की "  और दिल एक आज्ञाकारी पुत्र की तरह अपने पिता की हर बात की तरह इस बात को भी मान गया | आज जीत दिमाग की हुई हैं मगर उस प्यार का क्या जो आज भी मेरे और उसके अंदर उमड़ रहा है मगर दुनिया की किसी भी किताब के अन्दर इस रिश्ते का कोई नाम नहीं हैं मुझे शब्दों की ज़रुरत हैं इस प्यार को रिश्ते का नाम चाहिए |

किसीने रिश्ते का उपहार देकर चाहत को पा लिया ,
हम प्यार करतें हुए भी रिश्ता नहीं बना सकेे l



 





शनिवार, 14 मई 2011

क्या खबर थी की मुझे खुदा बन जाना था

मौत सौ शक्लों मैं डराती थी ,
हर शकल को मैंने खुदा मान लिया
अब न मौत मुझको डराती हैं
और न खुदा से मुझको डर लगता हैं
तम्मना यही थी की मौत को हराना था
क्या खबर थी की मुझे खुदा बन जाना था ----shamil

मंगलवार, 3 मई 2011

कुछ अनकही

जिंदा रहा तो मैंने कुछ काम कर लिया ,
ऐ मौत तेरे आज न आने का शुक्रिया ---शामिल 

दर्द  ही अब  जीने  की  वजह  बन  जाएगा  
मैं  भला  अब  दरद  दूर  क्यों  करूँ


जलते  हुए  इक  चिराग  ने  आँधियों  से  कहा
हिम्मत  है  तो  बुझा  के  दिखा
जलने  के  लिए  मुझे  कोनो  की  दरकार  नहीं  होती ....



उठती  लहरों  को  साहिल  की  दरकार  नहीं  होती
हौसलों  के  आगे  कोई  दीवार  नहीं  होती
जिस  इंसान  पर  खुदा  का  करम   होता  है ,
मंजिल  है  दूर  उससे  य  उसका  भरम  होता  है ,
चाहे  हों  लाख  कांटे  राह  में  उसकी ,
हर  काँटा  फूलों  की  तरह  नरम  होता  है …

लड़ती रही एक लौ

लड़ती रही एक लौ अँधेरे से ये सोच कर की मैं सही हूँ रह रह कर वो देती एक चुनौती और बीच बीच में वो खिड़की के बहार देखती की आ जाये कोई मसीहा हौसल...