शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

क्यों आते हो मेरे ख्वाब में बिना बुलाए

क्यों आते हो मेरे ख्वाब में बिना बुलाए
आज तुम फिर आये थे
बिना इज़ाज़त के बिना दस्तक दिए.
और न जाने कौन से बीते हुए लम्हों को छु गए
हम जग भी न पाये  हम सो भी न पाये
बस एक सरसराहट सी हुई
नींद के आगोश में जाकर
बीते हुए लम्हों को टटोल कर देखा
उसे आज से जोड़ कर देखा
कुछ भी नहीं था सिर्फ एक एहसास था
वो मीठी चुभन
जिसे पाने को मैं सब लुटाने को तैयार था
न जाने वो एह्साह क्यों  हो  रहा है
नींद में वो सब पाने का भाव हो रहा हैं
ये स्वप्न हैं स्वतः टूट जायेगा
वो भाव भी कहीं छूट जायेगा
फिर तुम भी अपने काम में लग जाओगे
मगर ये एहसास जगा कर जो तुम गए हो
ये बहुत दिन तक कायम रहेगा
फिर से उठूंगा मैं सपने बुनने के लिए
भूलने लगूंगा सब कुछ पल के लिए
लड़ने लगूंगा  फिर से अपने अस्तित्व के लिए
क्यों आते हो मेरे ख्वाब में बिना बुलाए बिना दस्तक दिए












मेरी तन्हाई पर रोने वालों तुम्हारा धन्यवाद


शायद तुम्हे तन्हाई ने बहुत रुलाया हैं
मगर मुझे जीने का ख्याल
इसी तन्हाई से ही आया हैं
शायद तुम्हे इसका साथ गवारा नहीं
मगर मुझे इससे प्यारा कोई नहीं
मैंने इंसानों को साथ छोड़ा हैं
मगर तन्हाई का नहीं
ये बात तुम्हे मै कैसे बताऊ
और कैसे अब तुम्हारे संग ये पल बिताऊं
जब तुम न होगे तो ये तन्हाई ही होगी
तुम्हारी कमी इस तन्हाई को बताऊंगा
गर छिन गयी ये तन्हाई
तो फिर क्या करेंगे हम
इस बेरहम दुनिया में
ज़ी न सकेंगे हम
मेरी तन्हाई पर रोने वालों तुम्हारा धन्यवाद

लड़ती रही एक लौ

लड़ती रही एक लौ अँधेरे से ये सोच कर की मैं सही हूँ रह रह कर वो देती एक चुनौती और बीच बीच में वो खिड़की के बहार देखती की आ जाये कोई मसीहा हौसल...