बुधवार, 27 अप्रैल 2011

बेवफा

बेवफा तेरी एक हँसी पर मेरी जान जाती थी,
आज तेरी जान जा रही हैं और मुझको हँसी आ रही हैं

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

पवन का झोका

एक ऐसा पवन का झोका था
जिसे किसी सरहद ने नहीं रोका था
अमन का नाम लेकर आया था
वो वास्तव मैं एक धोका  था
न नफरत इस तरफ थी
न नफरत उस तरफ थी
फिर य़े ज़हर कैसे भर गया
जो कभी भाई भाई करते नहीं थकता था
आज हिन्दू मुस्लमान कैसे हो गया

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

आदिवासी नक्सलाइट हो गया

अदि काल से किसी जगह पर रहने वाले को आदिवासी कहा जाता हैं ऐसा मैं बचपन से सुनता आया हूँ
और हम आर्य पुत्र हैं जो की बहार से आये हैं .समय के साथ साथ हमने बहुत विकास कर लिया हैं .मगर विकास की इस दौड़ मैं हम ये भूल गए हैं की जिनको हम विकास के नाम पर अपने साथ दौड़ना चाहते हैं क्या वे भी हमारे साथ इस दौड़ मैं शामिल होना चाहते हैं .हमारे विकास रूपे ढांचे मे हमने इन आदिवासी लोगों के  लिए कोई जगह नहीं बनाई हैं हमारा ढांचा हमारे लोग बस इतना ही .हम उन्हें अपने बनाये  हुए ढांचे में क्यों जोड़ना चाहतें  हैं जब की वे अपनी दुनिया में खुश हैं खेती करना समुदाय मे रहना येः सब वो अदि काल से करते आ रहे हैं क्यों उन्हें हम विकास की दौड़ मैं अपने साथ दौड़ा रहे हैं उनकी ज़मीन छीन कर उनकी सीमा का अतिक्रमण कर इस तरह हम अपने ही  भाइयों को अपने खिलाफ कर रहे हैं आज वो मजबूर होकर बन्दूक उठा रहे हैं जो की इस देश की विडम्बना हैं आज भाई को रोकने के लिए हम दूसरा भाई उसे मारने के लिए भेज रहे हैं अगर इसी तरह चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब हमें अपने ही लोगों से आज़ादी की जंग लड़नी पड़ेगी  और जिस दिन वो गरीब आदिवासी भाई अपना हक मांगने क लिए दिल्ली पहुच गए फिर वो सैलाब आएगा जिसको रोकने क लिए फिर से खून की नदियाँ बहने लगेगी इससे पहले समस्या ज्यादा बड़ी हो जाए हमें मिल कर इसका समाधान निकलना होगा.अन्याय और अत्याचार अगर किसी के ऊपर लगातार होता रहे तो उसे मजबूरन हथियार उठाना पडता हैं बड़े दुःख के साथ कहना पडता हैं की जो आदिवासी कभी किसान हुआ करता था आज वो हैं  नक्सलाइट हो गया हैं .में भी छत्तीसगढ़  का हूँ मगर आज मैं एक तथाकथित सभ्य समाज में रह रहा हूँ जहाँ भ्रस्टाचार  बेमानी अपनी चरम सीमा पर हैं मगर मेरे आँखें बंद हैं मुझे आँख खोलने की भी इजाजत नहीं हैं कितना बेबस हूँ  में अपने परिवार में हो रहे संग्राम को रोकने तक का हक नहीं हैं मेरा  परिवार ख़तम हो रहा हैं लोग मर रहे हैं एक आदिवासी (नस्क्ली) मरता हैं दो पुलिस वाले मरते हैं कुछ गलत हो रहा हैं मेरे मुल्क में इस नफरत के दौर में मेरा दम घुट रहा है काश कोई हो जो मरे इस घुटन को कम कर दे आज कोई मुझे मानवता का दरवाजा दिखा दे ताकि में अपने मुल्क के लिए उससे प्रार्थना कर सकूं --

कोई मिट रह है
कोई जल रह है
किसी को न परवाह
न किसी को यकीन है
ये कैसी फिजा चल रही है

जब जब शंख बजाई हैं

न जाने किसने लिक्खी हैं जो ऐसी तकदीर मिली ,
जब जब शंख बजाई है तब तब मैंने अजान सुनी  .

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

इस देश के मजहब का यारों

इस देश के मजहब का यारों ,
कुछ ऐसा वक़्त भी आएगा |
हिन्दू दफनाये जाएँगे,
मुस्लिम जलवाया जाएगा |


गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

मैं शायद इंसान नही

भूल चुकी ये दुनिया मुझको,
या मुझको मालूम नही
वक़्त के हांथों की कठपुतली
मैं शायद इंसान नही
भटक रहा हूँ द्वारे-द्वारे
मुझको अब संकोच नही
मंदिर से भी मिली हिराकत
मस्जिद का हाल यही
या अल्लाह अब तो बता दे
क्या तू ही मौजूद नही
वक्त के हांथों की कठपुतली
मैं शायद इंसान नही |

गुमशुदा

हूँ गुमशुदा इस दुनिया में,
ये जानता हूँ मैं
की ढूंढता अपना पता ये मानता हूँ मैं
ज़िन्दगी की ज़ीस्त मैं खो रहा हूँ
तनहा रातों को अकेला सो रहा हूँ
वक़्त दिखलाये मुझको कैसा भी मंज़र
होने न दूंगा ज़मीन को दिल की बंज़र
आज मुझको रोना था मैं रो चुका हूँ
आज अपने आप में ही खो चुका हूँ

क्या मतलब

क्या मतलब मंदिर जाने का,
जब दिल में तेरे राम न हो,
क्या मतलब मस्जिद जानेका
जब दिल में रहमान न हो
जो साथ न दे सके दुःख में
वो शायद इंसान न हो

दिल


मेरे दिल ने जो कहा वो में करता गया
जो लिखा था वो मुझे मिलता गया
गमे उल्फथें जो मेरे साथ थी
सारी दुनिया की मस्ती मेरे साथ थी
जो थोडा से में खुश हो गया
सारी दुनिया मुझसे खफा हो गयी

मौत


मौत तुझ़े आना हैं, हर दिल का तू फ़साना है
ज़िंदगी है दरबदर मगर तेरा एक ठिकाना है
रूप बदलतें हैं तेरे अनेक
मगर सभी में एक तराना है
कभी धूप कभी छाँव का आना है
मगर तेरा एक निश्चित काल पर आना है
जिस किसी ने ज़िन्दगी को देखा है
वो तेरे वजूद से अंजना है
तेर शकशियत को क्या करूं बयां
तू अपने आप में अफसाना है
मौत तू शायराना है
तुझे एक दिन आना है
मौत से दोस्ती ज़रूरी है
इंसा की बस यही मजबूरी है
आती हैं लम्हों के लिए
और सताती हैं ताउम्र
न ज़िन्दगी से प्यार हैं न मौत से यारी है
क्या बतायें कब किसकी बारी है
ऐ मौत तू एहसान फरामोश मत होना
ज़िन्दगी के साथ तूझ भी गले से लगाया है |

एक अरसा हुए मुस्कुरये हुए



एक अरसा हुए मुस्कुराए हुए ,
दर्द को तो हम थे छुपाए हुए |
आँख फौलाद थी,
जिस्म कमज़ोर था,
हौसलों में मगर दम न कमज़ोर था |
बढ़ गए काफिले मंजिलों की तरफ ,
एक में बस ही था जो इस ओर था |
दरद होठों में हो तो कुछ और बात हैं ,
दरद सीने में हो तो मज़ा और हैं,
देश पर मरने वालें तो लाखों मगर ,
जो अमन पर मरे कुछ और लोग हैं |
मकबरे जगमगाएंगे अपने मगर ,
देखने जो मिले तो मज़ा और हैं |

लड़ती रही एक लौ

लड़ती रही एक लौ अँधेरे से ये सोच कर की मैं सही हूँ रह रह कर वो देती एक चुनौती और बीच बीच में वो खिड़की के बहार देखती की आ जाये कोई मसीहा हौसल...