बुधवार, 24 जून 2020

लड़ती रही एक लौ

लड़ती रही एक लौ अँधेरे से
ये सोच कर की मैं सही हूँ
रह रह कर वो देती एक चुनौती
और बीच बीच में वो
खिड़की के बहार देखती
की आ जाये कोई मसीहा
हौसला आफजाई को
की तभी अचानक
कही जोर से आया एक हवा का झोका
लौ का साथ देने को
और फिर एक लम्बी ख़ामोशी छा गयी
हवा दरवाजे से बहार निकल गयी
और लौ ने तड़पते हुए
अँधेरे के सामने दम तोड़ दिया








रविवार, 2 फ़रवरी 2020

गलती किसकी


वो कैसे समझदार माँ  बाप हो सकतें हैं। जो अपनी औलाद पैदा कर के छोड़ देते हैं।
बिना कोई परवरिश दिए या बिना किसी ज़िम्मेदारी को पूरी किए हुए।
अछम्य अपराध है ये 
अगर वही औलाद  जवानी मे इसका जवाब उनका तिरस्कार कर के दे तो ?
हमारी मजबूरी थी, हम समझ नही पाए का नाम लेकर रो दतें हैं।
सिर्फ बड़ों को हो गलती कोई मजबूरी नही है
गलती सिर्फ औलाद करे ये भी कोई ज़रूरी नही है
इन दोनों के बीच का फर्क करना ही सच्चा ज्ञान है
कौन सही है और कौन गलत हर इंसान ये समझता है
सही तालीम और अच्छा जीवन देना माँ बाप का फ़र्ज़ हैं, और बुढ़ापे मे उनकी ज़िम्मेदारी उठाना बच्चों का फ़र्ज़ हैं अन्यथा ये दोनों एक जुर्म है
क्योंकि जो अपराधी समाज से निकल कर आते है
वो भी किसी माँ बाप की खोख से निकल कर आतें हैं |


 

लड़ती रही एक लौ

लड़ती रही एक लौ अँधेरे से ये सोच कर की मैं सही हूँ रह रह कर वो देती एक चुनौती और बीच बीच में वो खिड़की के बहार देखती की आ जाये कोई मसीहा हौसल...