गुरुवार, 29 सितंबर 2011



 ये लोग
आदम  और हव्वा के वंशज ये लोग
किस्मत के बरूखी के मारे ये लोग
मिटटी के शेर कहलाते ये लोग
अपनी औकात को छुपाते ये लोग
हर बात पे सवाल उठाते ये लोग
सच्चाई से मुह फेरते ये लोग
अपनी ही कब्र में दफ़न ये लोग
आँखों से न देख पाते ये लोग
कानो से न सुन पाते ये लोग
खुदगरजी के बोझ तले ये लोग
लोगों की भीड़ में खुद को खोजते ये लोग
इंसानियत को तरसते ये इंसानी लोग
अगर यही लोग हँ तो अफ़सोस हैं ये लोग




बुधवार, 28 सितंबर 2011

सफ़र

 
 
कुछ दूर तुम लेकर चलो
कुछ दूर मैं तुमको लेकर चलूँ
सफ़र यूं ही कट जाएगा
कुछ तुम गुनगुनाते हुए चलो
कुछ मैं गुनगुनाते हुए चलूँ

मंगलवार, 27 सितंबर 2011

ज़िंदगी



मेरी हर बात पे कहकहे लगाती ज़िन्दगी
कभी हंशाती तो कभी रुलाती ज़िंदगी
एक कठपुतली की तरह नचाती ज़िंदगी
गरीबी में पली एक अमीर ज़िंदगी
मेरे ख्वाबों ख्यालों की ज़िंदगी
एक परेशान बेजुबान सी ज़िंदगी 
शमशान की ओर ले जाती ज़िन्दगी
मौत से रूबरू कराती ज़िन्दगी
आवारा बदचलन ज़िंदगी
एक जवानों की बुजुर्ग ज़िंदगी
हर बात पे पेहरा  लगती ज़िंदगी
बदहवाश बेबाक ज़िंदगी
मौत के करीब ज़िंदगी को तरसती ज़िंदगी 


गुमनाम

हर पल का हिसाब माँगा उसने
हर पल का हिसाब दिया मैंने
हर एहसान का हिसाब माँगा उसने
हर एहसान का हिसाब दिया मैंने
ताउम्र वो मांगते ही गए
ताउम्र हम देते ही गए
इस लेन-देन के खेल में
वक़्त यूँ ही बढ़ता रहा
कुछ वो मुझसे कटता रहा
कुछ मैं उससे कटता रहा  
आज मेरी एक पहचान हैं
और वो एक गुमनाम सा हैं

रविवार, 25 सितंबर 2011

मुह्हबत

मुह्हबत भी मिली मक्कारी भी मिली मयखाने में
मुझे शराब भी पिलाई प्याली से पैमानों में
कहा शराब छोड़ दो दिखाने के लिए ज़माने में
गर मुह्हबत हैं तुझे तो इबादत करो उस रब से
ताकत दे तुझे हर रोज आने के लिए मैखाने में

सच्चाई

मैं सोचता था वो मुझे भूल जाएगी कुछ रोज में
उसे याद भी नहीं आयेगी मेरे किसी के आगोश में
मगर ये हो न सका
वो याद भी करती हैं मुझे हर रोज में
मेरे चर्चे भी करती हैं वो उसी के आगोश में

सोमवार, 19 सितंबर 2011

किसने कहा है

किसने कहा है तुम्हे बुझने के लिए ऐ दिए
जलतें रहो की अभी तेल बाकी है
किसने कहा है तुम्हे मुरझाने के लिए ऐ फूल
खिलते रहो की अभी सावन बाकी है
किसने कहा है तुम्हे रुकने के लिए ऐ दोस्त
दौड़ते रहो की अभी सास बाकी है
किसने कहा है तुम्हे जनाजे तक ले जाने को ऐ लोग
रुक जाओ की मुझमे अभी जान बाकी है
सिदयो तक याद करोगे मेरी बाते ऐ दौर
रुक जाओ की मेरी बात अभी बाकी है

रविवार, 11 सितंबर 2011

वक़्त


ये वक़्त हमारा दुश्मन हैं
ये वक़्त हमारा साथी भी
कुछ वक़्त की मोहलत मिल जाए
तो वक़्त बने जस्बाती भी
ये वक़्त वक़्त का वक़्त नहीं
ये वक़्त हैं वक़्त बिताने का
ये रक्तपात का वक़्त नहीं
ये वक़्त हैं रक्त मिलाने का
क्यों वक़्त से पहले आये थे
क्यों वक़्त के पहले जाते हो
जो वक़्त मिले तो दुश्मन को
तुम वक़्त का पाठ पढ़ाते हो
ये वक़्त हमारा दुश्मन हैं
ये वक़्त हमारा साथी भी
कुछ वक़्त की मोहलत मिल जाए
तो वक़्त बने जस्बाती भी

लड़ती रही एक लौ

लड़ती रही एक लौ अँधेरे से ये सोच कर की मैं सही हूँ रह रह कर वो देती एक चुनौती और बीच बीच में वो खिड़की के बहार देखती की आ जाये कोई मसीहा हौसल...