मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

डर

इस कदर परेशां रहने लगा हूँ
भीड़ मैं तनहा रहने लगा हूँ
करता था कभी उगते सूरज को सलाम
अब तो डूबते को भी करने लगा हूँ
डरता था अक्सर मौत से कभी
आज ज़िन्दगी से भी डरने लगा हूँ

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

लड़ो काटो मरो

लड़ो काटो मरो
एक दूसरे को घाव दो
चिथड़े ऊड़ा दो जिस्म के 
रूह को जिस्म से जुदा कर दो
मुह्हबत तुम्हे रास नहीं आयगी 
लोरी से भी तुम्हे नींद नहीं आयगी 
जिओ ऐसे ही जीते आये हो
लड़ो काटो मरो....
सफ़ेद रंग तुम्हे कभी शांति नहीं देगा
हरा रंग कभी हरियाली नहीं लायेगा
सिर्फ लाल रंग समझते हो तुम
खून की होली से सबको नहला दो
जस्न मनाओ अपने उन्माद में
की तुम आजाद हो बरसों से
लड़ो काटो मरो.......









मंगलवार, 29 नवंबर 2011

जख्म

जख्मों  के  निशान गहरे हैं अभी दिखा नहीं सकता
लगाए किसी अपने ने ही हैं बता नहीं सकता
दुख होगा तुम्हे जानकर की जख्म अभी हरे हैं
मगर हरियाली में भी हैं रास्ता मैं बता नहीं  सकता

सोमवार, 21 नवंबर 2011

बाजीगरी

तुम्हे अदावत रुलाती हैं
हमें मुह्हबत सताती हैं
तुम्हारे घर मुफलिसी का बसेरा हैं
अक्सर हमारे घर अमरी आती हैं
तुम बिक गए हो कारोबारे-इ-इश्क में
हमे इश्क की कारीगरी आती हैं
शक हो तो कभी आजमा लेना
हमे ज़िन्दगी की बाजीगरी आती हैं


शनिवार, 12 नवंबर 2011

थी और नहीं भी

तेरे आगोश में नींद आती भी थी
और नहीं भी
तू मुझको कई बार रुलाती भी थी
और नहीं भी
ये तो सच हैं की मैं उदास हूँ तुझसे मगर
तेरे बगैर ज़िन्दगी जी भी जाती भी थी
 और नहीं भी  

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

why something happens to you unexpected




Always expect the unexpected ,Never follow yourself or any one when you are drunk be cool and silent at that time, try to indulge yourself alone not with friends ,never sits with those to whom you don't know completely, never show your excitement at this time,
every man is having two faces in his life the second phase you can see only when you are
so close to him/her so never be close to anyone and never try to make any kind of relationship with human being .either good or bad because this is the reason of your sadness,never ask anything which is related to anyone's emotion ,don't try to find any good thing or bad thing from human being ,because it will always motivate you find  some mistake inside you or you will try to be good as him/her and in this process you lost yourself. Better to lose an argument and a friend rather to win any one of them .
Finally enjoy sadness as well as pain alone don't share it with anyone.
Conclusion:Speak less and understand more rather speak more and understand less.

खुदाई

मैं खुदा के साथ खेल रहा था
खुदा अपनी खुदाई के साथ खेल रहा था
मेरे साथ खेलता बच्चा यह सब देख रहा था
मासूमियत से उसने मेरी तेरफ देखा
और कहा उसे खेलने दो
उधर ध्यान न दो
मुझे पता हैं उसकी खुदाई क्या हैं
तुम बस मेरे साथ खेलो
क्योंकि कल मैं तुम्हारी जगह आऊंगा
और तुम मेरी जगह पर आओगे
कल मैं मजे उढ़ाउंगा
और तुम खेलते जाओगे
खुदा कल भी अपनी खुदाई से खेलता था,
खुदा कल भी अपनी खुदाई से खेलेगा
ये सिलसिला यूं ही चलता रहेगा
रह जाएँगे तो बस मैं और तुम

सोमवार, 3 अक्टूबर 2011

सिगरेट


वो हर बार मुझपर भरोसा करती हैं
मैं हर बार भरोसा तोड़ देता हूँ
वो हर वक़्त प्यार करती हैं
मैं प्यार कर के छोड़ देता हूँ
वो समझाती हैं बड़े प्यार से
मैं हाँ कह कर छोड़ देता हूँ
वो हर बार मुझको मुँह लगती हैं
मैं होठों पे लाकर छोड़ देता हूँ 
वो घेर कर खड़ी हुई हैं मुझे चारों ओर से
मैं भक्क सा उसे एक बार देख लेता हूँ
सदियाँ निकाल दी उसने मेरे साथ संजीदगी से
मैं आज भी उसे हलके मैं लेता हूँ
वो इश्क में मेरे जल जल के खाक हो रही
में उसे धुँआ बना कर हवा में छोड़ देता हूँ

गुरुवार, 29 सितंबर 2011



 ये लोग
आदम  और हव्वा के वंशज ये लोग
किस्मत के बरूखी के मारे ये लोग
मिटटी के शेर कहलाते ये लोग
अपनी औकात को छुपाते ये लोग
हर बात पे सवाल उठाते ये लोग
सच्चाई से मुह फेरते ये लोग
अपनी ही कब्र में दफ़न ये लोग
आँखों से न देख पाते ये लोग
कानो से न सुन पाते ये लोग
खुदगरजी के बोझ तले ये लोग
लोगों की भीड़ में खुद को खोजते ये लोग
इंसानियत को तरसते ये इंसानी लोग
अगर यही लोग हँ तो अफ़सोस हैं ये लोग




बुधवार, 28 सितंबर 2011

सफ़र

 
 
कुछ दूर तुम लेकर चलो
कुछ दूर मैं तुमको लेकर चलूँ
सफ़र यूं ही कट जाएगा
कुछ तुम गुनगुनाते हुए चलो
कुछ मैं गुनगुनाते हुए चलूँ

मंगलवार, 27 सितंबर 2011

ज़िंदगी



मेरी हर बात पे कहकहे लगाती ज़िन्दगी
कभी हंशाती तो कभी रुलाती ज़िंदगी
एक कठपुतली की तरह नचाती ज़िंदगी
गरीबी में पली एक अमीर ज़िंदगी
मेरे ख्वाबों ख्यालों की ज़िंदगी
एक परेशान बेजुबान सी ज़िंदगी 
शमशान की ओर ले जाती ज़िन्दगी
मौत से रूबरू कराती ज़िन्दगी
आवारा बदचलन ज़िंदगी
एक जवानों की बुजुर्ग ज़िंदगी
हर बात पे पेहरा  लगती ज़िंदगी
बदहवाश बेबाक ज़िंदगी
मौत के करीब ज़िंदगी को तरसती ज़िंदगी 


गुमनाम

हर पल का हिसाब माँगा उसने
हर पल का हिसाब दिया मैंने
हर एहसान का हिसाब माँगा उसने
हर एहसान का हिसाब दिया मैंने
ताउम्र वो मांगते ही गए
ताउम्र हम देते ही गए
इस लेन-देन के खेल में
वक़्त यूँ ही बढ़ता रहा
कुछ वो मुझसे कटता रहा
कुछ मैं उससे कटता रहा  
आज मेरी एक पहचान हैं
और वो एक गुमनाम सा हैं

रविवार, 25 सितंबर 2011

मुह्हबत

मुह्हबत भी मिली मक्कारी भी मिली मयखाने में
मुझे शराब भी पिलाई प्याली से पैमानों में
कहा शराब छोड़ दो दिखाने के लिए ज़माने में
गर मुह्हबत हैं तुझे तो इबादत करो उस रब से
ताकत दे तुझे हर रोज आने के लिए मैखाने में

सच्चाई

मैं सोचता था वो मुझे भूल जाएगी कुछ रोज में
उसे याद भी नहीं आयेगी मेरे किसी के आगोश में
मगर ये हो न सका
वो याद भी करती हैं मुझे हर रोज में
मेरे चर्चे भी करती हैं वो उसी के आगोश में

सोमवार, 19 सितंबर 2011

किसने कहा है

किसने कहा है तुम्हे बुझने के लिए ऐ दिए
जलतें रहो की अभी तेल बाकी है
किसने कहा है तुम्हे मुरझाने के लिए ऐ फूल
खिलते रहो की अभी सावन बाकी है
किसने कहा है तुम्हे रुकने के लिए ऐ दोस्त
दौड़ते रहो की अभी सास बाकी है
किसने कहा है तुम्हे जनाजे तक ले जाने को ऐ लोग
रुक जाओ की मुझमे अभी जान बाकी है
सिदयो तक याद करोगे मेरी बाते ऐ दौर
रुक जाओ की मेरी बात अभी बाकी है

रविवार, 11 सितंबर 2011

वक़्त


ये वक़्त हमारा दुश्मन हैं
ये वक़्त हमारा साथी भी
कुछ वक़्त की मोहलत मिल जाए
तो वक़्त बने जस्बाती भी
ये वक़्त वक़्त का वक़्त नहीं
ये वक़्त हैं वक़्त बिताने का
ये रक्तपात का वक़्त नहीं
ये वक़्त हैं रक्त मिलाने का
क्यों वक़्त से पहले आये थे
क्यों वक़्त के पहले जाते हो
जो वक़्त मिले तो दुश्मन को
तुम वक़्त का पाठ पढ़ाते हो
ये वक़्त हमारा दुश्मन हैं
ये वक़्त हमारा साथी भी
कुछ वक़्त की मोहलत मिल जाए
तो वक़्त बने जस्बाती भी

शनिवार, 13 अगस्त 2011

हमने पैसे कमाए हैं



बहुत दिनों से मैंने बाल भी नहीं बनाये हैं
कई रोज से मैंने कपडे भी नहीं सुखाये हैं
जब से तुम गए हो ज़िन्दगी वीरान हैं
हम तो लुट गए हैं कारोबार-ए-इश्क में
और वो समझते हैं की हमने पैसे कमाए हैं


शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

दौलत नहीं लायेंगे

हमने भी पैसे कमाए थे
किसी अपने पर ही उडाये थे
मुह्हबत थी किसी से
इसीलिए चम्पी करवाए थे
वो खाली न बैठें कभी
इसीलिए कपडे भी धुलवाए थे
यकीन नहीं था की वो अनजान कुछ समझ न पायेंगे
मेरी मोह्हबत को भी वो अहसान का कारोबार बताएँगे 
अब कुछ हम भी कर के दिखायेंगे
दोस्ती के बीच में कभी ये दौलत नहीं लायेंगे

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

आज मेहमान हो गए हैं

कभी दर्द बांटा करते थे आज दर्द की दुकान हो गए हैं
कल तक मालिक थे अपने घर के आज मेहमान हो गए हैं

सोमवार, 1 अगस्त 2011

ये कुत्ते



ये अपने मालिक को पहचानते भी हैं
रोटी कहाँ से आती है, ये जानते भी हैं

औकात अपनी अक्सर पहचानते भी हैं
कर दो जो अहसान तो ये मानते भी हैं

जब छिन गयी रोटी तो ये भौकते भी हैं
काटे किसी को देखकर ये भागते भी हैं

आवारा ज़लील बेशरम ये कुत्ते जो हैं
क्या चीज हैं इंसान ये जानते भी हैं ।

मेरी कमाई

तूने ज़िन्दगी भर दौलत कमाई हैं
मैंने ज़िन्दगी भर दौलत लुटाई हैं
तूने दौलत से मुह्हबत खरीदी हैं
मैंने खुद्दारी मैं मुह्हबत गवाई हैं

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

इंसान


 

जो भाई को भाई से लड़ाए गीता
जिहादी कहकर काफ़िर से लड़ाए कुरान
किसी भी सूरत में उसे खुदा क्या मिलेगा
जिसने कभी समझा ही नहीं इंसान को इंसान

रविवार, 24 जुलाई 2011

खामखाव्ह



मैं यूँ ही निकल गया उसकी ज़िन्दगी से खामखाव्ह
उसने रोका भी नहीं मुझे यूँ ही खामखाव्ह
वो हर शक्ल में शामिल को ढूँढती हैं खामखाव्ह
मैं हर रोज ही सामने से निकल जता हूँ खामखाव्ह
कुछ वो भी जिए जा रही हैं खामखाव्ह
कुछ मैं भी जिए जा रहा हूँ खामखाव्ह

बुधवार, 20 जुलाई 2011

ख्वाब

कैसे पूरा  होगा  हमारे  ख्वाबों  का मिलन ,
कुछ  ख्वाब  तेरे  बेबाकी  कुछ  ख्वाब  मेरे  जस्बती 

हो नहीं सकता



अमानत हैं तुम्हारी याद मेरी साँसो  में
कोई छीन ले ये मुझसे हो नहीं सकता 
तुम बेशक मुझको भूल जाओ गंवारा हैं मुझे
मैं तुमको भूल जाऊ हो नहीं सकता
तुम्हारे होठो की नमी अब तक मौजूद हैं मेरे होठों में
कोई मौसम सुखा दे इसे हो नहीं सकता
तुम्हारे आँखों की महक अब तक मौजूद हैं  मेरी आँखों में
इस महक को कोई मिटा दे ये हो नहीं सकता
खूब इतराओगी किसी और की बाँहों में आकर
छूट जाओ मेरी बाँहों से हो नहीं सकता
लाखो इल्जाम हैं मोहब्बत के मेरे ऊपर 
मैं बाइज्जत बरी हो जाऊ हो नहीं सकता
   

 


बुधवार, 13 जुलाई 2011

वो पेड़

जब फेका था पत्थर उस पर
उसने पलट कर वार नहीं किया
जब सीने से लगाया उसने भी जी भर कर प्यार किया
जहर लेकर मुजसे ज़खीरा अमृत का दिया
सुनकर मेरे सारे रंजो गम
सहारा उसने अपनी बाँहों का दिया
दूर रह कर भी मुजसे अपने
होने का अहसास उसने दिया
कुछ लोग थे उसके खिलाफ
अपनी तरक्की में उसे बाधा समझते थे
मुझे बहला कर खरीद लिया मुझसे
और मेरे सामने ही उसे काटे  जा रहे हैं
और मैं बुस्दिलों की तरह उसे कटते हुए देख रहा हूँ

मेरी सोच


इस हाथ से कमाई हैं दौलत
उस हाथ से उडाता हूँ मैं
गैर अब क्या लूटेंगे मुझको
अपनों से लुटवाता हूँ मैं
जो बनाया हैं अक्स अपना
खुद ही उससे घबराता हूँ मैं
फिर क्यों अपनों के गैर को
अपनाता हूँ मैं
मंजिलों का पता नहीं
रास्ते भी अनजाने से हैं
फिर क्यों उन्ही रास्तों में
जोर आजमाता हूँ मैं
गुमशुदा हूँ ज़िन्दगी से
और हौसला भी कमज़ोर हैं
क्यों घूम फिर कर उन्ही
चौराहों पर आ जाता हूँ में

सोमवार, 11 जुलाई 2011

बिंदास

हर फूल खफा हैं माली से
हर मांग जुदा है लाली से
हर ताज गिरे उस कदमो पर
जो प्यार करे मतवाली से
 

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

मुस्कुराता गम....




उठ गए सब लोग मेरी महफ़िल से 
एक जाम ही था जो साथ निभाता रहा,
बुझा दिया आँधियों ने हर मशाल को
एक जुगनू  था जो रात भर टिमटिमाता रहा
रो गयी खुशिया भी सुन कर दास्ताँ मेरी
एक गम बस ही था जो मुस्कुराता रहा |

मैंने इम्तेहान में ज़िन्दगी ली थी.....

लोग तो पार करतें हैं दरिया भी जहाज में बैठकर
मैंने तूफानों में भी कश्ती ली थी .
लोग मरते हैं गुलामी में जी जी कर
मैंने आज़ादी के लिए जान दी थी
लोग घुट घुट कर दम तोड़ते हैं तनहाई में
मैंने तो भीड़ में चैन की सांस ली थी.
लोगों की ज़िन्दगी में तो होते हैं इम्तेहान
मैंने इम्तेहान मैं ज़िन्दगी ली थी.....

सोमवार, 4 जुलाई 2011

आज उसे कौमी बनाया गया

मेरे पंखो को काट मुझे हवा में उड़ाया गया 
जो था मेरे अन्दर कल तक एक इंसानी जस्बात 
आज उसे कौमी बनाया गया  
इस तरह नफरत भर दी जेहन में मेरे
की हर शक्श में मुझे हिन्दू मुस्लमान नज़र आ गया 
वर्ण जाती अपने पराये से अनजान था मैं
मुझे उसी जाती वर्ण का सदस्य बनाया गया 
देकर सत्ता का गुरुर मुझको मचलाया गया 
मेरे ही द्वारा हर छोटे को पाँव तले कुचलवाया गया
खुश था मैं अपने आस्तित्व से मगर 
खुदा का दर्जा देकर मुझे मंदिरों मस्जिदों में बैठाया गया






रविवार, 3 जुलाई 2011

मैं परछाइयाँ बाँटता हूँ...........

मैं परछाइयाँ बाँटता हूँ
कब लगी ये आदत पता नहीं
पर शायद  जब मुझे पता लगा
कि रौशनी जो  मिलती है वो बिकाऊ है 
जब मुझे पता चला की जीना कम 
और कारोबार ज्यादा करना है
प्यार की खरीदारी होगी और भावनाओं की बोली लगेगी.
हाँ उस दिन से ही मैं परछाइयाँ बाँटता हूँ
और वो समझते हैं मैं रिश्ता निभाता हूँ 

शुक्रवार, 24 जून 2011

मुझे थोड़ी साँसे दे दो,मुझे थोड़ी इज्जत दे दो.......

एक दिन यूँ ही भटक रही थी जिंदगी
की अचानक उसे पंख मिले
और उसे लगा कर वो उड़ पड़ी 
मस्जिद पर से उडी और मंदिर पर से भी उडी 
उडती गयी उडती गयी
मयखानों को चूमा दवाखानों को दस्तक दी
थोड़ी गरीब नवाजी भी की और थोड़ा इश्क भी किया
सरहद पर ज्यों ही पहुंची परेशान सी हो गयी
कुछ लाशों को देखा और गोलियों की आवाज़ भी  सुनी 
देखा एक औरत खून से लथपथ रो रही थी
पूछा उस से कौन हो तुम
कहा मोहब्बत हूँ मैं और जो बगल में लाशें हैं
एक अमन और दूसरी शान्ति की है
मेरे दो बच्चे
मेरी आबरू लुट ली गयी
और मेरे बच्चों को गोली मार दी गयी
जीना हैं मुझे कुछ रोज और 
मुझे थोड़ी साँसे दे दो,मुझे थोड़ी इज्जत दे दो








 





मंगलवार, 21 जून 2011

वो मेरे लिए सबसे महँगी शराब लाएगी.........

करीब आ कर मुझे होठों से लगाएगी 
सिगरेट को मेरे बड़े प्यार से जलायेगी 
धुआं जो होगा वो उसमे खो जायेगी 
वो मेरे लिए सबसे महँगी शराब लाएगी 
थोड़ा खुद पीयेगी थोड़ा मुझे पिलाएगी 
फिर गोद में लेट कर 
मोहब्बत के गीत गुनगुनायेगी
आहिस्ता आहिस्ता मेरे आगोश में समा जायेगी 
मौत तू एक दिन जरूर आएगी........... 





अजीब सा रिश्ता बनाती है वो........

अजीब सा रिश्ता बनाती है वो 
कभी सहम सी जाती है
कभी बेख़ौफ़ हो जाती है
कभी तो बिस्तर से उठने ही नहीं देती
और कभी किसी के साथ भी लेट जाती है
जिन्दगी ये बता क्या मुझे रोज आजमाती है तू  .........


सोमवार, 13 जून 2011

इस उम्र मैं रिश्ते नहीं फ़रिश्ते आतें हैं



सारी याद ताजा हैं वो आज भी मेरी ख्वाबों मे आतीं है 
अचानक मुलाकात हो उनसे तो वो शर्मा जाती है
वो अपने दिल  के  कोने से  कुछ  कहती हैं ,
मैंने भी बेमन से उसे अनसुना कर देता हूँ
वो  मेरे सोए जस्बात को जगा देती मैं  फिर  उन्हें  गहरी  नींद  मैं   सुला  देता
वो  हर रोज  नया  रिश्ता बनाती मैं  एक  पुराना  रिश्ता मिटा देता
वो  पूछती  क्या  अब  भी  तुम्हे रिश्ते आते  हैं
मैं  कहता  इस  उम्र  मैं  रिश्ते नहीं  फ़रिश्ते  आतें  हैं 

शनिवार, 11 जून 2011

मैं और मेरी कमीनी जिंदगी ........

वो मुफलिसी का दौर था 
नियति कही अन्दर गहराई में दफन थी 
कभी कभी दिल बहलाने के लिए
जिन्दगी से गुफ्तगू  किया करता था 
मैं कहता था तारे तोड़ना है.
वो मुस्कुराते हुए कहती
पैसे ही तोड़ लाओ बहुत है 
मैं बेशर्म सा हँस देता था
लेकिन फक्र  भी होता था
बिना जेब वाले कपड़ों को देख कर
फटे नोट को फेक कर मिली
एक मात्र ख़ुशी को 
वो फिर से हाथ में थमा कर छीन लेती थी 
और हँसते हुए कहती लो बीड़ी खरीद लेना 
तब मैं एक बनावटी गुस्सा दिखा कर 
उसके बाल खींचता
वो चीखते हुए कहती 
जेब वाले कपडे कब पहनोगे 
मैं कहता 
जब पैसे  पेड़ पर उगेंगे  
वो कहती बेशर्म कही का 
मैं कहता कमीनी ज़िन्दगी
 











    
 













                   

गुरुवार, 9 जून 2011

आदमी पुराना हैं

कोई भी हो अड़चन झट से दूर कर जाता हैं
मेरा हमदम हैं मुश्किलो से नहीं घबराता हैं
ज़रुरत हो दिल की जो जान भी ले आता हैं
आदमी पुराना हैं हर वक़्त काम आता हैं

बुधवार, 8 जून 2011

रोटी कपडा और माकन ही गायब है इस वतन से



करतें  हैं  रहनुमा  जो  इंतजाम  बड़े  जतन  से
मिलतें  हैं  वो  भी  हमें  बड़े  सितम  से
कोई  पूछे  आकर  इस  देश  की  हालत  क्या है
रोटी  कपडा  और  माकन  ही  गायब  है  इस  वतन  से

गुरुवार, 2 जून 2011

दिलों से सभी को जोड़ता हूँ मैं

नहीं चाहिए पैसा ऐसा बोलता हूँ मैं

और पैसो से ही सबको तोलता हूँ मैं

मुफलिसी और गरीबी  सब मेरे साथ हैं

वक़्त आने पर  इनको छोडता हूँ मैं

नए रिश्तें मुझको मिले इस कदर

पुराने रिश्तो को तोड़ता  हूँ मैं

पुराने नए सारे पुल गिर गए

दिलों से सभी को जोड़ता हूँ मैं

खुश ही तो था जब मैं बच्चा था




घर ही न बनाते तो अच्छा था , 
किसी भी राह मैं सो जाते तो अच्छा था , 
बड़े होने की जिद में कहीं खो गया
खुश ही तो था जब मैं बच्चा था

बुधवार, 1 जून 2011

अरे हम खुदा हैं



कट भी गए मेरे हाथ तो फिर से उग आयेंगे ,
अरे हम खुदा हैं ,अब ये भी क्या तुम्हें फ़रिश्ते आकर बताएँगे ----शामिल

गुरुवार, 26 मई 2011

कहाँ गया उसे ढूंढो ....एक सत्य घटना

सर पर चोट लगने की वजह से मेरे पिताजी की याददाश्त   कमज़ोर हो गयी थी डॉक्टर की सलाह से उन्हें दिल्ली लाकर ऑपरेशन करने का विचार था पर पिताजी दिल्ली आने को तैयार नहीं थे बार बार कह रहे थे की कहीं नहीं जाना हैं मुझे मैं अपने बाप के घर को छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा जो इलाज करवाना हैं यहीं करवाओ माँ के बहुत समझाने के बाद वो एक हफ्ते के लिए दिल्ली आने को तैयार हो गयी और कहा की अगर वहां मन नहीं लगा तो दो दिन मैं ही चला आऊंगा उनकी इस बच्चे जैसी बातो को सुनकर सब  हंश्ने लगे . अगले दिन तयशुदा वक़्त पर हम दिल्ली चलने को तैयार हुए घर से निकलते ही पिताजी ने कहा  अपनी वो काली वाली टी-शर्ट दे पहनने को ये पुरानी शर्ट पहन कर मैं नहीं जाऊंगा मैंने गुस्से मैं देखा मगर उनको कोई फर्क नहीं पड़ा बोले सोच ले बाप चाहिए की शर्ट माँ ने बीच  में ही कहाँ की ठीक हैं दे दे इन्हें वो वाली शर्ट इनका भी नौटंकी ना   शर्ट पहनती हे उनका चेहरा ख़ुशी से खिल गया जैसे कोई जंग जीत ली हो शर्ट पहनते ही वो एक नवजवान की तरह लगने लगे थे.

बिलासपुर से दिल्ली तक पहुचते पहुचते उनका बुखार कुछ कम ज्यादा होता रहा मगर उन्होंने ज्यादा बात नहीं की बस बीच बीच मैं उठकर स्टेशन आने पर उनका नाम पूछते जातें थे सुबह ७ बजे ट्रेन स्टेशन पर थी  पिताजी  की तबियत वैसे की वैसे थी ऑटो लेकर हम घर पहुचे पिताजी ने कहा की मैं थक गया हूँ अभी आराम करूंगा कोई उठाना मत हम सब भी थके हुए थे तो आराम करने चले गए २ घंटे बाद जब सबने आँख खोली  तो देखा पिताजी गायब हैं , हमने यहाँ वहां देखा मगर वो नहीं दिखे  फिर छोटे भाई ने कहा अरे यार उनको तो रोज पीने की आदत हैं इसीलिए निकल गए  होंगे मैंने कहा सुबह सुबह हद करतें हैं यार अभी २ घंटे पहले ही तो आए  हैं सब ने कहा कोई नहीं आ जाएँगे जैसे जैसे समय बीतता गया उनका कोई पता नहीं चला माँ ने कहा शायद घर वापस चले गए होंगे वैसे भी बोल रहे थे की नहीं रुकुंगा लेकिन बोलकर तो जाना था ऐसे कैसे जा सकतें हैं शाम को घर फ़ोन लगा दिया गया सब परेशान हो रहे थे कोई ये कह रहा था की उनको ऐसे हालत में अकेला नहीं  छोड़ना था , लेकिन छोड़ने  की बात तो तब थी की जब हमें पता होता की वो भागने वाले हैं वो तो बिना कुछ बोले ही चले गए थे दो दिन हो गए उनका कोई पता नहीं चला अब हर तरफ खबर फैला दी गयी घर बाहर हर कोई परेशान और अंत मैं हार कर हम लोग थाने चले गए गुमशुदा की रिपोर्ट लिखवाने पहली बार मैं थाने जा रहा था वो माहौल मेरे लिए बिलकुल नया था हमने थानेदार से कहा एक ( F.I.R.) लिखवानी हैं गुमशुदा की उसने उपर से नीचे तक मुझे देखा और कहा कौन लापता हैं मैंने कहा मेरे पापा २  दिन से घर नहीं आए हैं उन्ही  की रिपोर्ट लिखवानी हैं हंसते हुए उसने कहा पकड़ कर क्यों नहीं रखतें हो अपने माँ बाप को अब कितने लोग यही केस लेकर रोज २ आ जातें हैं जाओ एक कागज मैं अपनी शिकायत लिखकर दे दो हम सील लगाकर दे देंगे मैंने कहाँ इनके बारे मैं जानकारी कब तक मिल जाएगी उसने कहा ज्यादा  सवाल न कर छोरे शिकायत लिख दी हैं न अपनी जब मिलेंगे तो हम खुद संपर्क केर लेंगे धन्यवाद कहने के सिवा हमारे पास और कुछ नहीं था.

घर आकर हम सब दोस्त भी अलग अलग दिशाओं में निकल पड़े उन्हें खोजने के लिए साथ मैं उनकी फोटो लेकर दिल्ली ( NCR ) में उनकी खोज जारी  रखी जब भी समय मिलता हम आस पास के इलाके में जाकर उनका पता करतें हर स्टेशन बस स्टैंड पर उनकी फोटो लगा रखी थी हमने एक एक दिन काटना हमारे लिए मुश्किल होता जा रहा था इधर माँ का हाल भी रो रो कर बुरा हो रहा था हर बार थाने जाकर अपना सा मुँह  लेकर आ जाते थे  अब तो थाने वाले भी फटकार लगाने लगे थे की सारी फोर्सं भेज दे तेरे बापू को खोजने में जब मिलेंगे तो बता देंगे एक दो बार तो ऐसे बातें बोली की मत पूछो एक ने कहा हाँ ज़रूर प्रोपर्टी का मामला होगा पता करना होगा की बाप जिंदा हैं की नहीं और अगर मर गया हैं तो हमसे प्रमाणपत्र चाहिए होगा येः बाप का प्यार नहीं प्रोपर्टी का मोह हैं ,मैंने भी चुटकी लेते हुए कहा मेरे बापू बेरोजगार थे और सारी  प्रोपर्टी शराब में उड़ा चुके हैं उनके नाम और माँ के सिवा हमारी कोई प्रोपर्टी नहीं हैं माफ़ किजियेगा सर आपको तकलीफ दी अब अपने बापू को खुद ही खोज लेंगे जवाब सुनकर उसने भी अपना मुँह फेर लिया अब तक हमें मालूम चल गया था की थाने वाले सिर्फ खानापूर्ति के लिए काम कर रहे हैं. हमने दुबारा थाने न जाने का फैसला कर लिया और अगले दिन से दुगनी तेजी से अपने पिता को ढूँढने में लग गए इस बार हमने समाचार पत्र में इश्तेहार निकला और मुख्या तौर पर हॉस्पिटल तथा वृधाश्रम में पढताल सुरु की एक बार तो हमे खबर मिली  की टगोर गार्डेन के पास एक ६० साल के आदमी की लाश मिली हैं जो की एक काली टी शर्ट पहने हुए था मैंने तुरंत अपने दोस्त को फ़ोन लगाया और उस हॉस्पिटल की तरफ निकल पड़े वहां पहुचते-पहुचते बहुत रात हो चुकी थी मुर्दा घर भी बंद हो चूका था बहुत मानाने पर उसने लाश दिखने की हामी भर दी लेकिन  उसने कहा की वो मुर्दा घर के अंदर नहीं जाएगा जैसे ही उसने दरवाजा खोला हमारा कलेजा मुँह में आ गया १०-१५ लाशे वहां रखी हुई थी. उसने कहा की सिनाक्थ करने के बाद मुझे बुला लेना  हम दोनों अंधरे में एक एक लाश को पहचानने की कोशिश कर रहे थे.

सब बुरे से बुरे हालत में थी मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे अंततः  एक भी लाश की सिनाक्थ नहीं हो सकी हम खुश थे की कम से कम इनमें तो वो नहीं थे मगर दुखी भी थे की उनका अभी तक कोई पता नहीं चला .उसके  कुछ दिन बाद हमने ( र.टी.इ ) फाइल किए मगर पिताजी का कहीं कोई पता नहीं चला येः विडम्बना हैं इस देश की .
यहाँ आम आदमी की सुरक्षा और जान की किसी को परवाह नहीं हैं यही हॉल अगर किसी मंत्री का होता तो सब की सब फोर्स  लग गयी होती और अब तक वो मिल भी गए  होते 

इस घटना को एक साल हो गए  हैं और अब तक कोई सुराग नहीं मिला हैं अब तो येः विश्वाश करना भी मुस्किल हो गया हैं की वो जिंदा भी हैं की नहीं इस घटना से माँ पूरी तरह टूट गयी हैं और उसने आश्रम जाने का फैसला कर लिया हैं अब वो किसी के साथ रहना नहीं चाहती भाई भी नौकरी के लिए दुसरे शहर चला गया हैं मैं भी किसी तरह अपनी ज़िन्दगी के दिन गिन रहा हूँ कभी कभी माँ से आश्रम में  मिलने चला जाता हूँ पिता की याद सबके जेहन से धुन्दली होती जा रही हैं और एक ही बात याद आती हैं पिताजी को लेकर की
" इतना रो चूका हूँ तुजे पाने की कोशिश मैं के अब अगर तू मिल भी जाए तो गम कम न होगा "
और अगर वो वापस आ भी गए तो क्या सब ठीक हो जाएगा..वो अकेले नहीं गए अपने साथ बहुत सारे सवालों के जवाब भी ले गहैं..इसी उम्मीद में की वो ज़रूर वापस आयेंगे अपने कुछ सवालो और हमारे कुछ जवाबो के साथ .........

शुक्रवार, 20 मई 2011

टूटा गुल्लक, बिखरा बचपन

"ले पढ़ बेहतरीन बुक है "मुझे आकाश ने मक्सिम गोर्की की मेरा बचपन देते हुए कहा.मैंने दो पन्ने पढ़े और उसे वापस देते हुए कहा मेरा भी एक बचपन था.सुन एक बिखरे बचपन की कहानी.वो दिन मेरे लिए लिए कुछ स्पेशल था.पिताजी ने एक मिटटी का गुल्लक मुझे ला कर दिया था.मुझे ये पता नहीं था की पिताजी करते क्या हैं और न ही कभी जानना चाहा.सुबह निकल जाते थे रात को आते थे और सब से पहले मुझे ही खोजते थे। "ये ले तेरा बैंक ,बैंक पता है ना हम सब जहाँ पैसे रखते हैं.उसकी सुरख्छा के लिए"मैं गुल्लक देख कर काफी खुश हुआ .ऐसा ही एक सुमित के पास भी था.जिसे वो पिग्गी बैंक कहता था.हर महीने उसका गुल्लक भर जाता था क्योंकि उसके पिताजी अमीर थे ऐसा माँ कहती थी .तब मैं अमीर को एक जाती या धर्म समझता था .खैर उस दिन के बाद गुल्लक मेरा सबसे प्यारा साथी हो गया मैंने सबसे पहले सुमित के घर जा कर उसे गुल्लक दिखाया."हे हे गधा खाली गुल्लक क्या दिखा रहा है.देख मेले पास तो इतने सारे भरे हुए गुल्लक हैं "सुमित ने मुझे चिढाते हुए कहा.तब मैंने भी ठान ली की एक महीने में अपना गुल्लक भर के उसे दिखाऊंगा |.

"बुआ पैसे दो ना मुझे गुल्लक भरनी है "मैंने प्यार से बुआ को कहा ."ये तुझे किसने ला कर दिया?" बुआ ने पूछा मैंने कहा पिताजी ने ."ओह तो अब इसे भरने के लिए पैसे कहाँ से लाएगा.जा अपने पिता जी से ही भरवा अब गुल्लक " बुआ ने पच्चीस पैसे देते हुए कहा। मैंने वो पच्चीस पैसे प्यार से गुल्लक में डाले और फिर उसे हिला कर पैसे की खनकने की आवाज़ सुनी.और फिर उस पर लिख दिया 'लवी का गुल्लक' वो एक ऐसा एहसास था जो मैं आज भी नहीं भूलता.वो पचीस पैसा मेरे पच्चीस लाख के पैकेज से ज्यादा कीमती था.उस दिन के बाद मुझे पैसे की खनक माँ की लोरियों से भी अच्छी लगने लगी.

"कितना जमा कर लिया लवी" पिता ने शाम को आते ही मुझसे पूछा ' पच्चीस पैसे बुआ ने दिए " मैंने कहा "ये ले एक रुपये मेरी तरफ से " पिता ने गुल्लक की और हाथ बढ़ाते हुए कहा " मैंने कहा नहीं मैं डालूँगा "|
"अच्छा तू ही डाल ले "पिता ने प्यार से सर सहलाते हुए कहा .तुझे पता है ये बहुत कीमती चीज है इसे ऐसे खुले में नहीं रखते जा ऊपर वाले कमरे में छुपा दे ".मैं दौड़कर उसे दादाजी की तस्वीर के पीछे रख दिया.लेकिन मेरा मन नहीं माना मैं कुछ देर बाद उसे फिर नीचे ले आया और उसे फिर हिला कर सिक्कों की आवाज़ सुनी जो की पहले से ज्यादा तेज़ थी.

स्कूल बैग में भी मैंने गुल्लक को डाला "ये क्या कर रहा है "माँ ने पूछा "ये मेरा नया दोस्त है मैं इसे अपने बाकि दोस्तों से स्कूल में मिलवाऊँगा.कुछ पैसे दो ना मम्मी मेरे गुल्लक के लिए " मैंने कहा." पच्चास पैसे तो तू रोज़ लेता ही है टाफी के लिए वही ले ले " मैंने वो पचास पैसे अपने गुल्लक में डाल दिए.

दिन कब बढ़ने लगे पता ही नहीं चला मेरा गुल्लक भी काफी भरी होने लगा | एक दिन स्कूल की परीक्षा आयी मुझे कुछ दिनों के लिए अपने गुल्लक से दूर जाना था ये सोच कर ही बड़ा अजीब लग रहा था मैंने अपने पिताजी से ये बात बताई तो उन्होंने कहा की हम लोग भी जब बाहर जातें हैं या कुछ दिन के लिए पैसे को कही  रहना हो तो उसे किसी बैंक मैं रख देतें हैं वहा पैसा सुरक्षित रहता हैं | पिताजी की बात पर मुझे पूरा विश्वाश था क्योंकि उस समय तक विश्वाश न करना क्या होता है मुझे पता नही था मैंने पूछा की पिताजी  मैं कैसे जमा कर सकता हूँ बैंक मैं पैसा वो बोले अभी इसको मरे पास रख दे परीक्षा के बाद तेरा भी खाता खुलवा देंगे मैं बड़ा खुश हुआ की अब मारा भी खाता होगा बैंक मे पिताजी ने कहा की ये ले मरे कमरे की चाभी और अपना गुल्लक वहां पर छुपा दे | 

मैं दौड़ता हुआ कमरे में गया और किताबो के पीछे उस गुल्लक को छुपा दिया फिर मैं चला आया परीक्षा की वजह से कुछ दिनों के लिए मेरा नाता उस गुल्लक से छूट गया लेकिन बहुत जल्द ही मेरी परीक्षाएं भी ख़तम हो गयी अब मुझे फिर से अपने गुल्लक का ख्याल आया उस दिन सुबह से ही पिताजी घर पर नहीं थे मेरे आँखें दरवाजे पर नज़र जमाये हुए थी की कब पिताजी आए और मैं कमरे मैं जाकर अपने गुल्लक को ले लूं .उस रात पिताजी शराब पीकर आए पहली बार मुझे समझ में आया की एक सामाजिक इंसान का शराब पीना कितनी बुरा हैं  क्योंकि जिस लहजे मैं वो बात कर रहे  थे ये मानना बड़ा मुस्किल था की ये वो ही मेरे पिता हैं जो सुबह मुझे ज्ञान की बातें सिखातें हैं खैर जैसे तैसे मैंने उनसे कमरे की चाभी ले और अपने गुल्लक को लेने चल पड़ा पर जैसे हे मैंने दरवाजा खोला मेरे पैरो तले की  ज़मीन खिसक  गयी मेरा गुल्लक फर्श पर टूटा पड़ा था |  

पहली बार मेरे आँखों से झर झर आँशु टपक रहे थे मैं रोता  हुआ अपने कमरे मैं गया और जाकर सो  गया अगले  दिन मुझे  उदास देखकर  माँ  ने पुछा क्या बात हैं मैंने सारी  घटना  उनको  बता  दी  सुनकर  माँ  ने कहा तू  इतनी  बड़ी  गलती  कैसे कर सकता हैं पहले  बताना  था न  तुझे  की तुने  गुल्लक वहां रखा  हैं रुक  मैं पूछती  हूँ | सामने  से पिताजी हँसतें  हुए आ  रहे  थे जैसे की कोई  शातिर बदमाश मुस्कुराता हुआ आता हैं  और आते ही  उन्होंने कहा की हाँ  कल  मैंने तेरा गुल्लक तोड़ दिया  करीब 40 रूपए  थे उसमें  जिसकी   मैंने शराब  पी ली  कोई  नहीं तेरे  लिए नया  गुल्लक ले लेंगे  रोता  क्यों  हैं.फिर रख देना मेरे  कमरे मैं इतना सुनते ही सब जोर जोर से हंश्ने लगे की और कहने लगे और  रख गुल्लक अपने बाप के पास उनकी हंशी जैसे मेरे लिए कटाक्ष से कम नहीं थी  मेरे जुबान  से एक शब्द  भी नहीं निकला  मैं समझ गया था की मेरा गुल्लक किसने  तोडा हैं कौन है वो  कोई  और नहीं मेरा अपना बाप हैं उस रात सिर्फ एक गुल्लक ही  नहीं टूटा था बल्कि  उसके  साथ  मेरा विश्वाश  और भरोसा  दोनों टूटा था | एक गुल्लक के टूटने का दर्द सिर्फ वो बच्चा ही समझ सकता हैं जिसने सपने में भी गुल्लक को अपने से दूर नही रखा और एक हवा के झोके के साथ वो सारे  सपने बिखर गए हो . इस घटना को आज पूरे २० साल हो गए हैं मगर आज भी उसको याद करने से दिल घबराता हैं | मेरे टूटे हुए गुल्लक के साथ साथ मेरा बचपन भी बिखर गया एक वो दिन था और एक आज का दिन हैं  तब से लाकर आज तक मैंने कभी गुल्लक नही रखा .....



मैंने उसूल निभाए हैं जज्बातों की जगह

मैंने उससे शादी का प्रस्ताव रखा , उसने तुरंत हाँ कर दिया फिर मैंने उससे कुंडली का मिलन किया हमारे सिर्फ १२ ही गुण मिल रहे थे , ये बात मैंने उसे बताई और कहा एक कुंडली की वजह से सपनो की मौत हो रही हैं उसने कुछ नहीं कहा फिर मैंने घरवालों से बात कही उनको सब मंज़ूर था कुंडली का दोष वो दूर करवाने के लिए तैयार थे मगर अंतरजातीय विवाह के खिलाफ थे l ये बात मैंने उसे भी बताई उसने कहा आप क्या सोचतें हैं ये बताओ l
मैंने कहा मुश्किल हैं घरवालों के खिलाफ जाना, कुछ देर खामोश रहने के बाद उसने कहा की हमारा रिश्ता अगर आगे नहीं बढ़ता तो कोई बात नहीं मगर आप मुझसे दूर मत जाना क्योंकि मैं आपसे प्यार करने लगी हूँ l
मैं स्तब्थ रह गया, मैंने कहा अभी हमे दो दिन ही हुए हैं मिले हुए और तुम्हे प्यार हो गया, उसने कहा इससे पहले कितने  ही लोग मिले हैं मुझसे मगर सब दोस्ती फिर प्यार और फिर शादी का ख्याल रखतें हैं मगर आपने पहले शादी का प्रस्ताव रखा, अच्छा लगा जानकर l
मैंने कहा अब शादी तो नहीं हो सकती अगर तुम नहीं चाहती तो हम बात करना छोड़ देतें हैं, नहीं तो बाद मे तुमको ही दिक्कत होगी l मुझे हालाकि तुमसे प्यार नहीं ,मगर फिर भी मैं तुमरा दिल नहीं तोडना चाहता हूँ जब तुम चाहो मुझे कह देना, मैं तुम्हारी ज़िन्दगी से चला जाऊंगा l कुछ ही दिनों  में हम अच्छे दोस्त हो गए रोज बातचीत का सिलसिला चलता रहा l एक दिन फिर उसने अचानक कहा अब भी तुमको मुझसे प्यार नहीं हुआ l
मैंने कहा मैं आज भी तुम्हारे जज्बातों की कद्र करता हूँ मगर मुझे ऐसा कोई अहसास नहीं हो रहा है, मुझसे बिछड़ने के बाद तुम्हे तकलीफ न हो इससे बेहतर है की हम मिलना छोड़ दे l
बार बार छोड़ने की धमकी क्यों देतें हो ऐसा कहकर वो चली गयी l मैं भी चला आया  |

कुछ दिन बाद उसका फ़ोन आया  " मुझे माफ़ कर दो मै ही पागल हूँ जो तुम्हे परेशान करती रहती हूँ एक ही सवाल पूछकर l मुझे पता है की तुम्हे मुझसे प्यार नहीं है पर एक बार झूठ ही कह दो ", फिर उसने कहा मेरी शादी तय हो गयी है l एक दो महीने मे मेरी शादी भी हो जाएगी एक आखरी बार आपका जवाब जानना है l

मैंने उसे शादी की बधाई देतें हुए कहा की जिससे तुम्हारी शादी होगी वो बहुत ही किस्मत का धनि होगा जो तुम्हारी जैसी लड़की उसे मिल रही    है l शादी से पहले वो मुझसे मिलना चाहती थी एक बार, मैंने हाँ कर दी अगले दिन हम मिले घंटों तक बात चली मैंने उससे पूछा लड़का देखने मे कैसा हैं उसने कहा मैंने उसे देखा नहीं हैं घर वालों ने बताया की देखने मे सुन्दर है मैंने कहा कुछ बातचीत तो हुई होगी उसने कहा घरवालों ने की हैं | उन्हें वो अच्छा लगा  मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा मैंने कहा बिना देखे और बात किए तुम कैसे हाँ कर सकती हो उसने कहा आपको तो देखा भी था और बात भी की थी क्या फायदा हुआ मेरे पास कोई शब्द ही नही थे मैंने उससे कहा आज के बाद हम कभी नहीं मिलेंगे हमारी कहानी बस यहीं तक थी  मैं नहीं चाहता की शादी के बाद मेरे नाम से कोई फसाद खड़ा हो ऐसा कहकर मैं चला गया , सुनने मे आया की कुछ ही दिनों मे उसकी शादी हो गयी मैं उसके लिए बहुत खुश था क्योंकि इतने दिनों मे वो मेरी बहुत अज़ीज़ दोस्त हो गयी थी |

इतने दिनों तक हम साथ मे थे मुझे कभी उसकी कमी नहीं खली लेकिन ये ख्याल आते ही अब शादी के बाद तो वो मुझसे बिलकुल ही नहीं मिलेगी मन अशांत सा हो गया अकेलापन मुझे सताने लगा हर पल उसी का ख्याल आने लगा जैसे मेरा दिल और दिमाग आपस मे लड़ने लगे . एक बाप बेटे की तरह और आज मेरा दिमाग फिर अपनी तर्कशक्ति पर फक्र मनाता हुआ दिल पर हंस रहा था | एक बार फिर जज्बातों  ने उसूलों के आगे घुटने टेक दिए हैं,  दिल सिर्फ ये कहता हुआ शांत हो गया की मैंने उसूल निभाए हैं जज्बातों की जगह  उससे मिलने से पहले मैंने कुछ उसूल बनाए थे जिसे मानना मेरे दिल को नितांत ज़रूरी था वो उसूल मेरे दिमाग का बनाया हुआ था  की  " मैं इकरार कैसे करता मैंने इजाजत ही नहीं दी थी दिल को प्यार करने की "  और दिल एक आज्ञाकारी पुत्र की तरह अपने पिता की हर बात की तरह इस बात को भी मान गया | आज जीत दिमाग की हुई हैं मगर उस प्यार का क्या जो आज भी मेरे और उसके अंदर उमड़ रहा है मगर दुनिया की किसी भी किताब के अन्दर इस रिश्ते का कोई नाम नहीं हैं मुझे शब्दों की ज़रुरत हैं इस प्यार को रिश्ते का नाम चाहिए |

किसीने रिश्ते का उपहार देकर चाहत को पा लिया ,
हम प्यार करतें हुए भी रिश्ता नहीं बना सकेे l



 





शनिवार, 14 मई 2011

क्या खबर थी की मुझे खुदा बन जाना था

मौत सौ शक्लों मैं डराती थी ,
हर शकल को मैंने खुदा मान लिया
अब न मौत मुझको डराती हैं
और न खुदा से मुझको डर लगता हैं
तम्मना यही थी की मौत को हराना था
क्या खबर थी की मुझे खुदा बन जाना था ----shamil

मंगलवार, 3 मई 2011

कुछ अनकही

जिंदा रहा तो मैंने कुछ काम कर लिया ,
ऐ मौत तेरे आज न आने का शुक्रिया ---शामिल 

दर्द  ही अब  जीने  की  वजह  बन  जाएगा  
मैं  भला  अब  दरद  दूर  क्यों  करूँ


जलते  हुए  इक  चिराग  ने  आँधियों  से  कहा
हिम्मत  है  तो  बुझा  के  दिखा
जलने  के  लिए  मुझे  कोनो  की  दरकार  नहीं  होती ....



उठती  लहरों  को  साहिल  की  दरकार  नहीं  होती
हौसलों  के  आगे  कोई  दीवार  नहीं  होती
जिस  इंसान  पर  खुदा  का  करम   होता  है ,
मंजिल  है  दूर  उससे  य  उसका  भरम  होता  है ,
चाहे  हों  लाख  कांटे  राह  में  उसकी ,
हर  काँटा  फूलों  की  तरह  नरम  होता  है …

बुधवार, 27 अप्रैल 2011

बेवफा

बेवफा तेरी एक हँसी पर मेरी जान जाती थी,
आज तेरी जान जा रही हैं और मुझको हँसी आ रही हैं

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

पवन का झोका

एक ऐसा पवन का झोका था
जिसे किसी सरहद ने नहीं रोका था
अमन का नाम लेकर आया था
वो वास्तव मैं एक धोका  था
न नफरत इस तरफ थी
न नफरत उस तरफ थी
फिर य़े ज़हर कैसे भर गया
जो कभी भाई भाई करते नहीं थकता था
आज हिन्दू मुस्लमान कैसे हो गया

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

आदिवासी नक्सलाइट हो गया

अदि काल से किसी जगह पर रहने वाले को आदिवासी कहा जाता हैं ऐसा मैं बचपन से सुनता आया हूँ
और हम आर्य पुत्र हैं जो की बहार से आये हैं .समय के साथ साथ हमने बहुत विकास कर लिया हैं .मगर विकास की इस दौड़ मैं हम ये भूल गए हैं की जिनको हम विकास के नाम पर अपने साथ दौड़ना चाहते हैं क्या वे भी हमारे साथ इस दौड़ मैं शामिल होना चाहते हैं .हमारे विकास रूपे ढांचे मे हमने इन आदिवासी लोगों के  लिए कोई जगह नहीं बनाई हैं हमारा ढांचा हमारे लोग बस इतना ही .हम उन्हें अपने बनाये  हुए ढांचे में क्यों जोड़ना चाहतें  हैं जब की वे अपनी दुनिया में खुश हैं खेती करना समुदाय मे रहना येः सब वो अदि काल से करते आ रहे हैं क्यों उन्हें हम विकास की दौड़ मैं अपने साथ दौड़ा रहे हैं उनकी ज़मीन छीन कर उनकी सीमा का अतिक्रमण कर इस तरह हम अपने ही  भाइयों को अपने खिलाफ कर रहे हैं आज वो मजबूर होकर बन्दूक उठा रहे हैं जो की इस देश की विडम्बना हैं आज भाई को रोकने के लिए हम दूसरा भाई उसे मारने के लिए भेज रहे हैं अगर इसी तरह चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब हमें अपने ही लोगों से आज़ादी की जंग लड़नी पड़ेगी  और जिस दिन वो गरीब आदिवासी भाई अपना हक मांगने क लिए दिल्ली पहुच गए फिर वो सैलाब आएगा जिसको रोकने क लिए फिर से खून की नदियाँ बहने लगेगी इससे पहले समस्या ज्यादा बड़ी हो जाए हमें मिल कर इसका समाधान निकलना होगा.अन्याय और अत्याचार अगर किसी के ऊपर लगातार होता रहे तो उसे मजबूरन हथियार उठाना पडता हैं बड़े दुःख के साथ कहना पडता हैं की जो आदिवासी कभी किसान हुआ करता था आज वो हैं  नक्सलाइट हो गया हैं .में भी छत्तीसगढ़  का हूँ मगर आज मैं एक तथाकथित सभ्य समाज में रह रहा हूँ जहाँ भ्रस्टाचार  बेमानी अपनी चरम सीमा पर हैं मगर मेरे आँखें बंद हैं मुझे आँख खोलने की भी इजाजत नहीं हैं कितना बेबस हूँ  में अपने परिवार में हो रहे संग्राम को रोकने तक का हक नहीं हैं मेरा  परिवार ख़तम हो रहा हैं लोग मर रहे हैं एक आदिवासी (नस्क्ली) मरता हैं दो पुलिस वाले मरते हैं कुछ गलत हो रहा हैं मेरे मुल्क में इस नफरत के दौर में मेरा दम घुट रहा है काश कोई हो जो मरे इस घुटन को कम कर दे आज कोई मुझे मानवता का दरवाजा दिखा दे ताकि में अपने मुल्क के लिए उससे प्रार्थना कर सकूं --

कोई मिट रह है
कोई जल रह है
किसी को न परवाह
न किसी को यकीन है
ये कैसी फिजा चल रही है

जब जब शंख बजाई हैं

न जाने किसने लिक्खी हैं जो ऐसी तकदीर मिली ,
जब जब शंख बजाई है तब तब मैंने अजान सुनी  .

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

इस देश के मजहब का यारों

इस देश के मजहब का यारों ,
कुछ ऐसा वक़्त भी आएगा |
हिन्दू दफनाये जाएँगे,
मुस्लिम जलवाया जाएगा |


गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

मैं शायद इंसान नही

भूल चुकी ये दुनिया मुझको,
या मुझको मालूम नही
वक़्त के हांथों की कठपुतली
मैं शायद इंसान नही
भटक रहा हूँ द्वारे-द्वारे
मुझको अब संकोच नही
मंदिर से भी मिली हिराकत
मस्जिद का हाल यही
या अल्लाह अब तो बता दे
क्या तू ही मौजूद नही
वक्त के हांथों की कठपुतली
मैं शायद इंसान नही |

गुमशुदा

हूँ गुमशुदा इस दुनिया में,
ये जानता हूँ मैं
की ढूंढता अपना पता ये मानता हूँ मैं
ज़िन्दगी की ज़ीस्त मैं खो रहा हूँ
तनहा रातों को अकेला सो रहा हूँ
वक़्त दिखलाये मुझको कैसा भी मंज़र
होने न दूंगा ज़मीन को दिल की बंज़र
आज मुझको रोना था मैं रो चुका हूँ
आज अपने आप में ही खो चुका हूँ

क्या मतलब

क्या मतलब मंदिर जाने का,
जब दिल में तेरे राम न हो,
क्या मतलब मस्जिद जानेका
जब दिल में रहमान न हो
जो साथ न दे सके दुःख में
वो शायद इंसान न हो

दिल


मेरे दिल ने जो कहा वो में करता गया
जो लिखा था वो मुझे मिलता गया
गमे उल्फथें जो मेरे साथ थी
सारी दुनिया की मस्ती मेरे साथ थी
जो थोडा से में खुश हो गया
सारी दुनिया मुझसे खफा हो गयी

मौत


मौत तुझ़े आना हैं, हर दिल का तू फ़साना है
ज़िंदगी है दरबदर मगर तेरा एक ठिकाना है
रूप बदलतें हैं तेरे अनेक
मगर सभी में एक तराना है
कभी धूप कभी छाँव का आना है
मगर तेरा एक निश्चित काल पर आना है
जिस किसी ने ज़िन्दगी को देखा है
वो तेरे वजूद से अंजना है
तेर शकशियत को क्या करूं बयां
तू अपने आप में अफसाना है
मौत तू शायराना है
तुझे एक दिन आना है
मौत से दोस्ती ज़रूरी है
इंसा की बस यही मजबूरी है
आती हैं लम्हों के लिए
और सताती हैं ताउम्र
न ज़िन्दगी से प्यार हैं न मौत से यारी है
क्या बतायें कब किसकी बारी है
ऐ मौत तू एहसान फरामोश मत होना
ज़िन्दगी के साथ तूझ भी गले से लगाया है |

एक अरसा हुए मुस्कुरये हुए



एक अरसा हुए मुस्कुराए हुए ,
दर्द को तो हम थे छुपाए हुए |
आँख फौलाद थी,
जिस्म कमज़ोर था,
हौसलों में मगर दम न कमज़ोर था |
बढ़ गए काफिले मंजिलों की तरफ ,
एक में बस ही था जो इस ओर था |
दरद होठों में हो तो कुछ और बात हैं ,
दरद सीने में हो तो मज़ा और हैं,
देश पर मरने वालें तो लाखों मगर ,
जो अमन पर मरे कुछ और लोग हैं |
मकबरे जगमगाएंगे अपने मगर ,
देखने जो मिले तो मज़ा और हैं |

बुधवार, 30 मार्च 2011

जो मांगा हक ..........


जो मांगा हक तो सताया गया,मुझे मेरे ही मुल्क से भगाया गया.

नहीं चाहिए इन खुदाओं की हस्ती..........


ये मंदिर गिरा दो ये मस्जिद गिरा दो,गिरा दो मुझे भी नज़र से गिरा दो
नहीं चाहिए इन खुदाओं की हस्ती,जहाँ बुत खड़े हो और जलती हो बस्ती ।

मंगलवार, 29 मार्च 2011

बेटी की बिदाई अच्छी लगी


कहतें हैं भारत में रोटी के बाद सबसे बड़ी समस्या बेटी की है .दोस्त की शादी में लखनऊ गया था.मुझे देखकर वो प्रसन्न हो गया अपने गले मिला फिर रिश्तेदारों से परिचय कराया.जल्दी से तैयार हो कर मैं उसकी बरात में शामिल हो गया फिर वही नाच गाना और पटाखे .शीला की जवानी और मुन्नी बदनाम .मैंने भी अनमने ढंग से थोड़ी कमर हिला दी.फिर लड़की के घर पहुंचा वहां काफी गर्मजोशी से स्वागत हुआ मैं सबसे पेहले जा कर लड़की के पिता से मिला . मुझे पिता बहुत पसंद हैं और मुझे उनसे गुफ्तगू करने में काफी मजा आता है . "नमस्ते अंकल " मैंने कहा उन्होंने जितना हो सका उतना सर झुका कर मेरा अभिवादन किया.शायद वो जिन्दगी में कभी इतना नहीं झुके होंगे .मुझे अचानक दुष्यंत कुमार की पक्तियां याद गयी | "ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा " | पूरी रात मैं उस पिता की झुका ही हुआ पाया.और दोस्त का पिता वो तो ऐसे छाती चौड़ी कर के घूम रहा था जैसे आज उसे सरकार बनाने का न्योता मिला हो .लड़की का पिता रह रह के सबसे हाल चाल पूछ रहा था.उसके चेहरे पे चिंता और तसल्ली दोनों भाव दिख रहे थे.लड़की की माँ और साहेलिया द्ल्हे राजा को बस निहार रही थी | थोड़ी छेड़खानी भी चल रही थी ,थोडा मौका मिलने पे मैं लड़की के पिता से बात करने चला गया. "एक बहुत बड़ा बोझ हल्का हो रहा है बेटा " .एक लम्बी सांस लेकर उन्होंने कहा| उसके पैदा होने के बाद ही मैंने पाई पाई जोड़ना शुरु कर दिया था.ऊफ अब थोड़ी तसल्ली मिल रही है ,मैं जरा चौंका."बिटिया के जाने का कोई दुःख तो हो रहा होगा अंकल " वो थोडा झेंप गए मैंने शायद उनकी दुखती रग पर हाथ रख दिया था ."अब हाँ आआआआ ..थोड़ा दुःख तो होता है बेटा इन्ही हाथों ने उसे पाल पोष के बड़ा किया है" आप तो बिलकुल हिंदी फिल्मों के बाप के डायलौग मार रहे हैं " मैंने कोल्ड ड्रिंक उनकी तरफ बढाते हुए कहा .उनके चेहरे पे एक अजीब सा भाव गया जैसे कह रहे हो "क्यों परेशान कर रहे हो बेटा" 'खाना खा लिया तुमने .?....'उन्होंने पूछा "हाँ अंकल. तो जाओ एन्जॉय करो और वहां से निकल गएँ.मैं हल्का सा मन ही मन मुकुराया उफ्फ्फ एक और बाप को दुखी किया मैंने मेरे सवाल अक्सर बापों को दुखी करते हैं .

फिर
कन्यादान का समय आया. पिता एकदम जल्दी जल्दी सब काम निपटा रहे थे जैसे की सोचा रहे हों जल्दी से सब ख़त्म हो और कल से चैन की जिंदगी जियूँगा .मैं इनके पीछे जा के खड़ा हो गया |उन्होंने मुझे घुरा .शायद हिंदी फिल्म के बाप वाली बात याद गयी हो . और फिर मूह से बियर की बदबू भी तो रही थी,खैर रसम पूरी होते होते सुबह हो गयी ओर बिदाई का वक़्त आ गया पिता ने अपनी बेटी को गले से लगाया ओर कहा "अच्छे से रहना ससुराल में " पाँव छूकर बेटी न हाँ में जवाब दिया माँ भी फूट फूट कर रो रही थी | लड़के ने तपाक से लड़की का हाथ पकड़ा और बिना पीछे मुड़े कार मैं बैठ गया | वे लोग घर को चल दिए,कुछ देरतक सब उनको निहार रहे थे और फिर एक लम्बी ख़ामोशी छा गयी |पिता ने माँ से कहा घर चलें अब तो लड़की भी बिदा हो गयी | माँ ने भी हाँ में हाँ मिलाई पिता का उदास चहेरा फिर से खिल उठा मैंने उनसे पुछा अभी तो अंकल आप रो रहे थे और अचानक खुश हो गए बात क्या हैं | "वो तो सब फूट फूट कर रो रहे थे तो में भी रोने लगा, वर्ना मुझे बेटी की रुखसती अच्छी लगी" | "चलो कोल्ड ड्रिंक पीते हैं बेटा" उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा ....

सोमवार, 28 मार्च 2011

शायरियां

क्यों खुदा अपने बन्दों से मज़ा लेता हैं
जब रहता हैं सगरे-मीना मे,
तो पता क्यों मंदिर मस्जिद का उन्हें देता हैं

वो जान जा रही हैं किसी बेजुबान की
तौहीन हो रही हैं गीता कुरान की

कोई मुझ से भी पूछे शहर का आलम, यहाँ खुले आम होते हैं इस्मत के सौदे.........
मैंने उस से पूछा क्या मुझसे प्यार है,मेरे होठो पे होठ रख के उसने कहा पता नहीं .........

मैं बोसा भी लेता हूँ तो लोग मर जातें हैं
कैसा जहर भर दिया तूने मेरे जेहेन मैं

आगे बढ़ा तो मैं अम्बर को खा गया
पीछे मुड़ा जो मैं तो सूरज को खा गया
कहतें हैं अब मुझको बदल गया शामिल
मैं कहता मुझको आज जीना आ गया

मैं खुद नहीं जनता कि क्या चाहता है आदमी
आज आरक्षण तो कल संरक्षण मांगता हैं आदमी

इंसानीयत मर गयी हैं हर बार जाता देता हूँ
जब भी पूछ्तें हैं घरवाले कब आओगे मिलने
तारीख अगले महीने की बता देता हूँ

एहसान तले इतनी दबती हैं ज़िन्दगी
की हर साक्ष एहसान फरामोश हो जाता हैं

मेरे मरने के बाद उनका इकरार आया,
मेरे आखरी हंशी पर उन्हीं प्यार आया

क़यामत की रात वो हमसे मिलने आयी
न वो कुछ कह पाय न हम कुछ कह पाय
वो आँखों हे आँखों में हमारे हो चुके थे
एक हम थे जो कब क सो चुके थे
आज तजुर्बा हैं तो लोग बुज़ुर्ग कहतें हैं
यदी तजुर्बा न होता तो लोग ऐतबार नहीं करतें



धर्म की हानी

धर्म की अभीव्यक्ति की तो मसीहा हो गया
बाँटता अपने ज्ञान को इंसान ही रहता

ज्ञान रुपी बीज जो अंदर ही था मेरे
मासीहा जब बना तो अंकुरित हो गया

धर्म की हानि जब जब हुई यहाँ
पैगम्बर बना कभी तो कभी राम हो गया

रविवार, 27 मार्च 2011

आप पढ़े लिखे लगते हैं ......

"क्या यही बस कोनी जाती है "बिलासपुर बस स्टैंड के पास खड़े हो कर विदेशी सब से पूछ रही थी."हौ"बस स्टैंड पर खड़े एक देहाती ने कहा .विदेशी ने आश्चर्य चकित हो कर उसे देखा.तुरंत हिंदी शब्द कोष में "हौ" का अर्थ खोजने लगी तब तक वो देहाती जा चुका था बिदेशी ने दुसरे से भी वही पूछा जवाब फिर "हौ" मिला .मुझ से रुका नहीं गया मैंने उसके पास जा कर कहा यहाँ पर आपको जवाब "हौ" ही मिलेगा.ये लोग अनपढ़ जो ठहरे इनके "हौ" का मतलब है जी हाँ.उसके चेहरे पे तसल्ली के भाव थे .शायद उसे उसका जवाब मिल गया.जाते जाते उसने कहा एक आप ही मुझे पड़े लिखे लगते हैं | मैंने मुस्कुरा कर कहा हौ.

रविवार, 20 मार्च 2011

जाटों का आरक्षण और मेरी माँ का अधुरा ऑपरेशन.........


दो दिन पहले ही मैंने अपनी टिकट करवाई थी | आबू-रोड मे माँ का ऑपरेशन होना था ,आज होली का दिन था १० बज चुके थे मैं निकला स्टेशन क लिए मगर आज तो ऑटो वाले भी अपनी मनमानी कर रहे थे कोई चलने को तैयार न था ,स्टेशन पहुच कर पता चला की सारी ट्रेन रद्द हैं | सारे स्टेशन में तोड़ फोड़ मची हुई है पूछने पर पता चला की यह जाटों का उपद्रव है आरक्षण की मांग को ले कर| उलटे पाँव वापस आने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं था |धौला कुआँ पर आकर मैं रुका की वहां से बस पकड़ कर चला जाऊँ पर आज तो उनका भी दिन है ,सामान्य किराया से दुगना किराया और वो भी चुनिन्दा बसों में सारे यात्री गाय और बकरी की तरह भरे हुए थे| बस इंसानों क लिए नहीं थी |अनमने ढंग से मैं घर की तरफ वापस चला, बार बार माँ का ऑपरेशन याद आ रह था कि बेटा जल्दी चले आओ डॉकटर कह रह हैं जल्द से जल्द ऑपरेशन करना पड़ेगा ,शायद आज मैं अपने आप को बेबस महसूस कर रह था आज जाटों के आरक्षण के आगे मेरी माँ का ऑपरेशन छोटा पढ रह था |

कोई मिट रह है


कोई मिट रह है
कोई जल रह है
किसी को न परवाह
न किसी को यकीन है
ये कैसी फिजा चल रही है

लड़ती रही एक लौ

लड़ती रही एक लौ अँधेरे से ये सोच कर की मैं सही हूँ रह रह कर वो देती एक चुनौती और बीच बीच में वो खिड़की के बहार देखती की आ जाये कोई मसीहा हौसल...