सोमवार, 8 अक्टूबर 2012

क्योंकि हमे किसी से मुह्हबत नहीं थी

जहाँ हर पल उसके ख्वाब में पलता हैं
वो सूखा पेड़ भी अब गुलमोहर लगता हैं
न जाने वक़्त कैसे बदल गया
मैं चोट खा कर भी संभल गया
ज़िन्दगी इतनी भी हरी नहीं थी
क्योंकि हमे किसी से मुह्हबत नहीं थी

ज़िन्दगी अब फिर से लोरी सुनाती हैं
अनुभव फिर से कहानी बतातें हैं
ये अतीत के झरोखे
फिर से दिल बहलाते हैं
अब हर बात सुन मन खिलता हैं
यूँ एकांकी भी मेरी फितरत नहीं थी
क्योंकि हमे किसी से मुह्हबत नहीं थी

मौसम बदल रहा हैं
कुछ मैं भी बदल रहा हूँ
दिन अब सुहाना लगता हैं
रात भी मतवाली नज़र आती हैं
ये दोपहरी आज से पहले खूबसूरत नहीं थी
क्योंकि हमे किसी से मुह्हबत नहीं थी

शनिवार, 6 अक्टूबर 2012

जवाब ढूँढ लाई हैं

छीन कर ज़माने से
छोटा सा बवाल लाई हैं
ज़िन्दगी मेरे सवालों का
जवाब ढूँढ लाई हैं

वही सादगी वही रवानगी
फिर वही बहार लाई हैं
ज़िन्दगी ....
वही रकीब वही दोस्त
फिर वही प्यार लाई हैं
ज़िन्दगी...

छोड़ कर गम का दामान
ज़िन्दगी मेरे पास आयी हैं
ज़िन्दगी मेरे सवालों का
जवाब ढूँढ  लाई हैं

ऐतबार

खुदा से ऐतबार टूट जायेगा
जब मुझसे कोई बच्चा रूठ जायेगा
उसके चेहेरे की खुशी ही इबादत हैं मेरी
बदले में मंदिरों-मस्जिद छूट जायेगा
चाहो तो देकर देखो उसकी आँखों में आँशु
बद्दुयाओं का साया तुम्हारे पीछे लग जायेगा

लड़ती रही एक लौ

लड़ती रही एक लौ अँधेरे से ये सोच कर की मैं सही हूँ रह रह कर वो देती एक चुनौती और बीच बीच में वो खिड़की के बहार देखती की आ जाये कोई मसीहा हौसल...