बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

तुम्ही संसद में जाते हो

कभी मंदिर गिराते हो
कभी मस्जिद गिराते हो
कभी दंगे कराते हो
कभी तुम घर जलाते हो
कभी अन्दर करते हो
गरीबी तुम बढ़ाते हो
बड़ा अफ़सोस हैं तुम पर
तुम्ही संसद में जाते हो
तुम्ही संसद में जाते हो

लड़ती रही एक लौ

लड़ती रही एक लौ अँधेरे से ये सोच कर की मैं सही हूँ रह रह कर वो देती एक चुनौती और बीच बीच में वो खिड़की के बहार देखती की आ जाये कोई मसीहा हौसल...