मंगलवार, 26 जुलाई 2011

इंसान


 

जो भाई को भाई से लड़ाए गीता
जिहादी कहकर काफ़िर से लड़ाए कुरान
किसी भी सूरत में उसे खुदा क्या मिलेगा
जिसने कभी समझा ही नहीं इंसान को इंसान

रविवार, 24 जुलाई 2011

खामखाव्ह



मैं यूँ ही निकल गया उसकी ज़िन्दगी से खामखाव्ह
उसने रोका भी नहीं मुझे यूँ ही खामखाव्ह
वो हर शक्ल में शामिल को ढूँढती हैं खामखाव्ह
मैं हर रोज ही सामने से निकल जता हूँ खामखाव्ह
कुछ वो भी जिए जा रही हैं खामखाव्ह
कुछ मैं भी जिए जा रहा हूँ खामखाव्ह

बुधवार, 20 जुलाई 2011

ख्वाब

कैसे पूरा  होगा  हमारे  ख्वाबों  का मिलन ,
कुछ  ख्वाब  तेरे  बेबाकी  कुछ  ख्वाब  मेरे  जस्बती 

हो नहीं सकता



अमानत हैं तुम्हारी याद मेरी साँसो  में
कोई छीन ले ये मुझसे हो नहीं सकता 
तुम बेशक मुझको भूल जाओ गंवारा हैं मुझे
मैं तुमको भूल जाऊ हो नहीं सकता
तुम्हारे होठो की नमी अब तक मौजूद हैं मेरे होठों में
कोई मौसम सुखा दे इसे हो नहीं सकता
तुम्हारे आँखों की महक अब तक मौजूद हैं  मेरी आँखों में
इस महक को कोई मिटा दे ये हो नहीं सकता
खूब इतराओगी किसी और की बाँहों में आकर
छूट जाओ मेरी बाँहों से हो नहीं सकता
लाखो इल्जाम हैं मोहब्बत के मेरे ऊपर 
मैं बाइज्जत बरी हो जाऊ हो नहीं सकता
   

 


बुधवार, 13 जुलाई 2011

वो पेड़

जब फेका था पत्थर उस पर
उसने पलट कर वार नहीं किया
जब सीने से लगाया उसने भी जी भर कर प्यार किया
जहर लेकर मुजसे ज़खीरा अमृत का दिया
सुनकर मेरे सारे रंजो गम
सहारा उसने अपनी बाँहों का दिया
दूर रह कर भी मुजसे अपने
होने का अहसास उसने दिया
कुछ लोग थे उसके खिलाफ
अपनी तरक्की में उसे बाधा समझते थे
मुझे बहला कर खरीद लिया मुझसे
और मेरे सामने ही उसे काटे  जा रहे हैं
और मैं बुस्दिलों की तरह उसे कटते हुए देख रहा हूँ

मेरी सोच


इस हाथ से कमाई हैं दौलत
उस हाथ से उडाता हूँ मैं
गैर अब क्या लूटेंगे मुझको
अपनों से लुटवाता हूँ मैं
जो बनाया हैं अक्स अपना
खुद ही उससे घबराता हूँ मैं
फिर क्यों अपनों के गैर को
अपनाता हूँ मैं
मंजिलों का पता नहीं
रास्ते भी अनजाने से हैं
फिर क्यों उन्ही रास्तों में
जोर आजमाता हूँ मैं
गुमशुदा हूँ ज़िन्दगी से
और हौसला भी कमज़ोर हैं
क्यों घूम फिर कर उन्ही
चौराहों पर आ जाता हूँ में

सोमवार, 11 जुलाई 2011

बिंदास

हर फूल खफा हैं माली से
हर मांग जुदा है लाली से
हर ताज गिरे उस कदमो पर
जो प्यार करे मतवाली से
 

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

मुस्कुराता गम....




उठ गए सब लोग मेरी महफ़िल से 
एक जाम ही था जो साथ निभाता रहा,
बुझा दिया आँधियों ने हर मशाल को
एक जुगनू  था जो रात भर टिमटिमाता रहा
रो गयी खुशिया भी सुन कर दास्ताँ मेरी
एक गम बस ही था जो मुस्कुराता रहा |

मैंने इम्तेहान में ज़िन्दगी ली थी.....

लोग तो पार करतें हैं दरिया भी जहाज में बैठकर
मैंने तूफानों में भी कश्ती ली थी .
लोग मरते हैं गुलामी में जी जी कर
मैंने आज़ादी के लिए जान दी थी
लोग घुट घुट कर दम तोड़ते हैं तनहाई में
मैंने तो भीड़ में चैन की सांस ली थी.
लोगों की ज़िन्दगी में तो होते हैं इम्तेहान
मैंने इम्तेहान मैं ज़िन्दगी ली थी.....

सोमवार, 4 जुलाई 2011

आज उसे कौमी बनाया गया

मेरे पंखो को काट मुझे हवा में उड़ाया गया 
जो था मेरे अन्दर कल तक एक इंसानी जस्बात 
आज उसे कौमी बनाया गया  
इस तरह नफरत भर दी जेहन में मेरे
की हर शक्श में मुझे हिन्दू मुस्लमान नज़र आ गया 
वर्ण जाती अपने पराये से अनजान था मैं
मुझे उसी जाती वर्ण का सदस्य बनाया गया 
देकर सत्ता का गुरुर मुझको मचलाया गया 
मेरे ही द्वारा हर छोटे को पाँव तले कुचलवाया गया
खुश था मैं अपने आस्तित्व से मगर 
खुदा का दर्जा देकर मुझे मंदिरों मस्जिदों में बैठाया गया






रविवार, 3 जुलाई 2011

मैं परछाइयाँ बाँटता हूँ...........

मैं परछाइयाँ बाँटता हूँ
कब लगी ये आदत पता नहीं
पर शायद  जब मुझे पता लगा
कि रौशनी जो  मिलती है वो बिकाऊ है 
जब मुझे पता चला की जीना कम 
और कारोबार ज्यादा करना है
प्यार की खरीदारी होगी और भावनाओं की बोली लगेगी.
हाँ उस दिन से ही मैं परछाइयाँ बाँटता हूँ
और वो समझते हैं मैं रिश्ता निभाता हूँ 

लड़ती रही एक लौ

लड़ती रही एक लौ अँधेरे से ये सोच कर की मैं सही हूँ रह रह कर वो देती एक चुनौती और बीच बीच में वो खिड़की के बहार देखती की आ जाये कोई मसीहा हौसल...