कभी भाव दिखाती हैं
कभी नखरे
कभी सपने दिखा कर
कीमत भी वसूल करती हैं
कभी मेरी तरफदारी
तो कभी मेरी खिलाफत करती हैं
कभी मुझमे उसे
अदाकार नज़र आता हैं
तो कभी मंजा हुआ गुनेहगार
मैं कब तुझे समझ पाउँगा
ए जिंदगी तू एक तवायफ सी हो गयी है
कई जगह बंटी हुई
कभी नखरे
कभी सपने दिखा कर
कीमत भी वसूल करती हैं
कभी मेरी तरफदारी
तो कभी मेरी खिलाफत करती हैं
कभी मुझमे उसे
अदाकार नज़र आता हैं
तो कभी मंजा हुआ गुनेहगार
मैं कब तुझे समझ पाउँगा
ए जिंदगी तू एक तवायफ सी हो गयी है
कई जगह बंटी हुई