रविवार, 9 सितंबर 2012

ये देश

महंगाई बढ़ रहा हैं
गरीब डर रहा हैं
जनता लड़ रहा हैं
माध्यम वर्गी मर रहा हैं
नेता घपला कर रहा हैं
बच्चा ऐसे ही  पल रहा हैं
देश में ऐसा ही  चल रहा हैं
पुलिस डंडा चला रहा हैं
विद्यार्थी हत्कंडा लगा रहा हैं
प्रकृति तबाही दिला रहा हैं
इंसान सजा पा रहा हैं
एक वक़्त हैं
जो चलता जा रहा हैं .....

बोल मेरी माँ कहाँ जाना है तूझे

भटक रहा हूँ जीवन के अँधेरे में
उजाले की ओर लाना है तूझे
बोल मेरी माँ कहाँ जाना है तूझे
ख़तम हो रही है सारी दुनियां मैं सच्चाइया
बढ़ रही है दिशायों में झूठ की परछाइया
सच क्या है झूठ बतलाना हें तूझे
बोल मेरी माँ कहाँ जाना है तूझे
स्वर्ग क्या हें येः मुझको तो मालूम नही
नरक की गहराईया मुझको तो मालूम नही
फर्क क्या हें दोनों मैं बतलाना हाँ तूझे
बोल मेरी माँ कहाँ जाना है तूझे
फासले बढ़ते रहे दो दिलों के बीच मैं
इनसान भी बाँटते गए उंच मैं और नीच मैं
सत्य क्या हें जीवन का बतलाना हें तूझे
बोल मेरी माँ कहाँ जाना है तूझे

लड़ती रही एक लौ

लड़ती रही एक लौ अँधेरे से ये सोच कर की मैं सही हूँ रह रह कर वो देती एक चुनौती और बीच बीच में वो खिड़की के बहार देखती की आ जाये कोई मसीहा हौसल...