शनिवार, 25 अगस्त 2012

उकता गए हैं तुझसे ए ज़िन्दगी

उकता गए हैं तुझसे ए ज़िन्दगी
वाकई में हम
फिजा में रंग नहीं
ज़ीने का ढंग नहीं
भीड़ में धँसता आदमी
दौलत में फंसता आदमी
उकता गए हैं तुझसे ए ज़िन्दगी
वाकई में हम
तपेदिक से मरता हुआ
एड्स से डरता हुआ
सहमा हुआ, डरा हुआ
भक्क सा दिखता  हुआ
उकता गए हैं तुझसे ए ज़िन्दगी
वाकई में हम

शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

पोशीदा से लोग

पोशीदा से लोग
हर वक़्त तकाजे में भिड़े हुए
कुछ उकताए हुए ज़िंदगी से
कुछ कहकहा लगाये हुए
कुछ इशक बाजी  में गुल
कुछ मटरगस्ती में गुल
कुछ बदहवासी में गुम
कुछ तनाव में गुम
पोशीदा से लोग
कुछ पोशीदा से लोग

लड़ती रही एक लौ

लड़ती रही एक लौ अँधेरे से ये सोच कर की मैं सही हूँ रह रह कर वो देती एक चुनौती और बीच बीच में वो खिड़की के बहार देखती की आ जाये कोई मसीहा हौसल...