बुधवार, 30 मार्च 2011

जो मांगा हक ..........


जो मांगा हक तो सताया गया,मुझे मेरे ही मुल्क से भगाया गया.

नहीं चाहिए इन खुदाओं की हस्ती..........


ये मंदिर गिरा दो ये मस्जिद गिरा दो,गिरा दो मुझे भी नज़र से गिरा दो
नहीं चाहिए इन खुदाओं की हस्ती,जहाँ बुत खड़े हो और जलती हो बस्ती ।

मंगलवार, 29 मार्च 2011

बेटी की बिदाई अच्छी लगी


कहतें हैं भारत में रोटी के बाद सबसे बड़ी समस्या बेटी की है .दोस्त की शादी में लखनऊ गया था.मुझे देखकर वो प्रसन्न हो गया अपने गले मिला फिर रिश्तेदारों से परिचय कराया.जल्दी से तैयार हो कर मैं उसकी बरात में शामिल हो गया फिर वही नाच गाना और पटाखे .शीला की जवानी और मुन्नी बदनाम .मैंने भी अनमने ढंग से थोड़ी कमर हिला दी.फिर लड़की के घर पहुंचा वहां काफी गर्मजोशी से स्वागत हुआ मैं सबसे पेहले जा कर लड़की के पिता से मिला . मुझे पिता बहुत पसंद हैं और मुझे उनसे गुफ्तगू करने में काफी मजा आता है . "नमस्ते अंकल " मैंने कहा उन्होंने जितना हो सका उतना सर झुका कर मेरा अभिवादन किया.शायद वो जिन्दगी में कभी इतना नहीं झुके होंगे .मुझे अचानक दुष्यंत कुमार की पक्तियां याद गयी | "ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा " | पूरी रात मैं उस पिता की झुका ही हुआ पाया.और दोस्त का पिता वो तो ऐसे छाती चौड़ी कर के घूम रहा था जैसे आज उसे सरकार बनाने का न्योता मिला हो .लड़की का पिता रह रह के सबसे हाल चाल पूछ रहा था.उसके चेहरे पे चिंता और तसल्ली दोनों भाव दिख रहे थे.लड़की की माँ और साहेलिया द्ल्हे राजा को बस निहार रही थी | थोड़ी छेड़खानी भी चल रही थी ,थोडा मौका मिलने पे मैं लड़की के पिता से बात करने चला गया. "एक बहुत बड़ा बोझ हल्का हो रहा है बेटा " .एक लम्बी सांस लेकर उन्होंने कहा| उसके पैदा होने के बाद ही मैंने पाई पाई जोड़ना शुरु कर दिया था.ऊफ अब थोड़ी तसल्ली मिल रही है ,मैं जरा चौंका."बिटिया के जाने का कोई दुःख तो हो रहा होगा अंकल " वो थोडा झेंप गए मैंने शायद उनकी दुखती रग पर हाथ रख दिया था ."अब हाँ आआआआ ..थोड़ा दुःख तो होता है बेटा इन्ही हाथों ने उसे पाल पोष के बड़ा किया है" आप तो बिलकुल हिंदी फिल्मों के बाप के डायलौग मार रहे हैं " मैंने कोल्ड ड्रिंक उनकी तरफ बढाते हुए कहा .उनके चेहरे पे एक अजीब सा भाव गया जैसे कह रहे हो "क्यों परेशान कर रहे हो बेटा" 'खाना खा लिया तुमने .?....'उन्होंने पूछा "हाँ अंकल. तो जाओ एन्जॉय करो और वहां से निकल गएँ.मैं हल्का सा मन ही मन मुकुराया उफ्फ्फ एक और बाप को दुखी किया मैंने मेरे सवाल अक्सर बापों को दुखी करते हैं .

फिर
कन्यादान का समय आया. पिता एकदम जल्दी जल्दी सब काम निपटा रहे थे जैसे की सोचा रहे हों जल्दी से सब ख़त्म हो और कल से चैन की जिंदगी जियूँगा .मैं इनके पीछे जा के खड़ा हो गया |उन्होंने मुझे घुरा .शायद हिंदी फिल्म के बाप वाली बात याद गयी हो . और फिर मूह से बियर की बदबू भी तो रही थी,खैर रसम पूरी होते होते सुबह हो गयी ओर बिदाई का वक़्त आ गया पिता ने अपनी बेटी को गले से लगाया ओर कहा "अच्छे से रहना ससुराल में " पाँव छूकर बेटी न हाँ में जवाब दिया माँ भी फूट फूट कर रो रही थी | लड़के ने तपाक से लड़की का हाथ पकड़ा और बिना पीछे मुड़े कार मैं बैठ गया | वे लोग घर को चल दिए,कुछ देरतक सब उनको निहार रहे थे और फिर एक लम्बी ख़ामोशी छा गयी |पिता ने माँ से कहा घर चलें अब तो लड़की भी बिदा हो गयी | माँ ने भी हाँ में हाँ मिलाई पिता का उदास चहेरा फिर से खिल उठा मैंने उनसे पुछा अभी तो अंकल आप रो रहे थे और अचानक खुश हो गए बात क्या हैं | "वो तो सब फूट फूट कर रो रहे थे तो में भी रोने लगा, वर्ना मुझे बेटी की रुखसती अच्छी लगी" | "चलो कोल्ड ड्रिंक पीते हैं बेटा" उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा ....

सोमवार, 28 मार्च 2011

शायरियां

क्यों खुदा अपने बन्दों से मज़ा लेता हैं
जब रहता हैं सगरे-मीना मे,
तो पता क्यों मंदिर मस्जिद का उन्हें देता हैं

वो जान जा रही हैं किसी बेजुबान की
तौहीन हो रही हैं गीता कुरान की

कोई मुझ से भी पूछे शहर का आलम, यहाँ खुले आम होते हैं इस्मत के सौदे.........
मैंने उस से पूछा क्या मुझसे प्यार है,मेरे होठो पे होठ रख के उसने कहा पता नहीं .........

मैं बोसा भी लेता हूँ तो लोग मर जातें हैं
कैसा जहर भर दिया तूने मेरे जेहेन मैं

आगे बढ़ा तो मैं अम्बर को खा गया
पीछे मुड़ा जो मैं तो सूरज को खा गया
कहतें हैं अब मुझको बदल गया शामिल
मैं कहता मुझको आज जीना आ गया

मैं खुद नहीं जनता कि क्या चाहता है आदमी
आज आरक्षण तो कल संरक्षण मांगता हैं आदमी

इंसानीयत मर गयी हैं हर बार जाता देता हूँ
जब भी पूछ्तें हैं घरवाले कब आओगे मिलने
तारीख अगले महीने की बता देता हूँ

एहसान तले इतनी दबती हैं ज़िन्दगी
की हर साक्ष एहसान फरामोश हो जाता हैं

मेरे मरने के बाद उनका इकरार आया,
मेरे आखरी हंशी पर उन्हीं प्यार आया

क़यामत की रात वो हमसे मिलने आयी
न वो कुछ कह पाय न हम कुछ कह पाय
वो आँखों हे आँखों में हमारे हो चुके थे
एक हम थे जो कब क सो चुके थे
आज तजुर्बा हैं तो लोग बुज़ुर्ग कहतें हैं
यदी तजुर्बा न होता तो लोग ऐतबार नहीं करतें



धर्म की हानी

धर्म की अभीव्यक्ति की तो मसीहा हो गया
बाँटता अपने ज्ञान को इंसान ही रहता

ज्ञान रुपी बीज जो अंदर ही था मेरे
मासीहा जब बना तो अंकुरित हो गया

धर्म की हानि जब जब हुई यहाँ
पैगम्बर बना कभी तो कभी राम हो गया

रविवार, 27 मार्च 2011

आप पढ़े लिखे लगते हैं ......

"क्या यही बस कोनी जाती है "बिलासपुर बस स्टैंड के पास खड़े हो कर विदेशी सब से पूछ रही थी."हौ"बस स्टैंड पर खड़े एक देहाती ने कहा .विदेशी ने आश्चर्य चकित हो कर उसे देखा.तुरंत हिंदी शब्द कोष में "हौ" का अर्थ खोजने लगी तब तक वो देहाती जा चुका था बिदेशी ने दुसरे से भी वही पूछा जवाब फिर "हौ" मिला .मुझ से रुका नहीं गया मैंने उसके पास जा कर कहा यहाँ पर आपको जवाब "हौ" ही मिलेगा.ये लोग अनपढ़ जो ठहरे इनके "हौ" का मतलब है जी हाँ.उसके चेहरे पे तसल्ली के भाव थे .शायद उसे उसका जवाब मिल गया.जाते जाते उसने कहा एक आप ही मुझे पड़े लिखे लगते हैं | मैंने मुस्कुरा कर कहा हौ.

रविवार, 20 मार्च 2011

जाटों का आरक्षण और मेरी माँ का अधुरा ऑपरेशन.........


दो दिन पहले ही मैंने अपनी टिकट करवाई थी | आबू-रोड मे माँ का ऑपरेशन होना था ,आज होली का दिन था १० बज चुके थे मैं निकला स्टेशन क लिए मगर आज तो ऑटो वाले भी अपनी मनमानी कर रहे थे कोई चलने को तैयार न था ,स्टेशन पहुच कर पता चला की सारी ट्रेन रद्द हैं | सारे स्टेशन में तोड़ फोड़ मची हुई है पूछने पर पता चला की यह जाटों का उपद्रव है आरक्षण की मांग को ले कर| उलटे पाँव वापस आने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं था |धौला कुआँ पर आकर मैं रुका की वहां से बस पकड़ कर चला जाऊँ पर आज तो उनका भी दिन है ,सामान्य किराया से दुगना किराया और वो भी चुनिन्दा बसों में सारे यात्री गाय और बकरी की तरह भरे हुए थे| बस इंसानों क लिए नहीं थी |अनमने ढंग से मैं घर की तरफ वापस चला, बार बार माँ का ऑपरेशन याद आ रह था कि बेटा जल्दी चले आओ डॉकटर कह रह हैं जल्द से जल्द ऑपरेशन करना पड़ेगा ,शायद आज मैं अपने आप को बेबस महसूस कर रह था आज जाटों के आरक्षण के आगे मेरी माँ का ऑपरेशन छोटा पढ रह था |

कोई मिट रह है


कोई मिट रह है
कोई जल रह है
किसी को न परवाह
न किसी को यकीन है
ये कैसी फिजा चल रही है

लड़ती रही एक लौ

लड़ती रही एक लौ अँधेरे से ये सोच कर की मैं सही हूँ रह रह कर वो देती एक चुनौती और बीच बीच में वो खिड़की के बहार देखती की आ जाये कोई मसीहा हौसल...