शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

तवायफ सी जिंदगी

कभी भाव दिखाती हैं
कभी नखरे
कभी सपने दिखा कर
कीमत भी वसूल करती हैं 
कभी मेरी तरफदारी
तो कभी मेरी खिलाफत करती हैं
कभी मुझमे उसे
अदाकार नज़र आता हैं
तो कभी मंजा हुआ गुनेहगार
मैं कब तुझे समझ पाउँगा
ए जिंदगी तू एक तवायफ सी हो गयी है
कई जगह बंटी हुई

इस जहाँ से बाहर

उसकी मुस्कराहट
मेरे काफिये को पूरा करती थी
उसकी एक झलक
मेरी ग़ज़ल को पूरा करती थी
उसका साथ होना
एहसास था मेरे होने का    
आज एक अजब ख़ामोशी हैं
मेरे काफिये तंग हैं
गजल अधूरी
और मैं अपुर्ण
मुझे पता हैं
अब मेरे काफिये में
कभी वजन नहीं आएगा
मेरे आँखों के सूखे आंशु
कभी बह नहीं पाएंगे
ज़िन्दगी जो आज थम गयी हैं
शायद कभी रफ़्तार में नहीं आएगी
वो आज कहीं चला गया हैं
मुझसे दूर बहुत दूर
और ये सच हैं की
वो फिर कभी नहीं आएगा
उसकी याद और जुस्तुजू ही
अब जीने का सहारा हैं
मुझे उम्मीद की हम
मिलेंगे इस जहाँ के बाहर
जहाँ ज़िन्दगी फिर से
सुरु होगी
जहाँ मेरी गजल
फिर से पूरी होगी
और मेरे काफिये
कभी तंग नहीं होंगे
इस जहाँ से बाहर
इस जहाँ से बाहर

रविवार, 11 नवंबर 2012

भूख

मेरे छोड़े हुए खाने को
वो बच्चा खा रहा था
जीवन का ये भी एक सच हैं
वो मासूमियत से सिखा रहा था
उसके सूखे हुए होठ
पानी की कीमत समझा रहे थे
उसके खाने की रफ़्तार
भोजन की अमूर्तता बता रही थी
मैं खाना अधूरा छोड़ कर
स्वाद से युक्त हो रहा था
वो अधूरा खाना खा कर
अपनी भूख से मुक्त हो रहा था

रविवार, 4 नवंबर 2012

हांथों की लकीरे


मेरे हांथों की लकीरे भी मुझसे
दूर जाने लगी हैं
किसी और के हाथों की मेहंदी
अब उसे भाने लगी हैं
बड़ी सिद्दत से कैद किया था
उन्हें हाथों में
अब वो भी आज़ादी के गीत
गुनगुनाने लगी हैं
कल तक वो मेरी थी
अब किसी और की हैं
ये बात मुझे सताने लगी हैं
में चाह के भी उसे रोक नहीं सकता
वो किस्मत हैं किसी और को आजमाने लगी हैं 

सोमवार, 8 अक्टूबर 2012

क्योंकि हमे किसी से मुह्हबत नहीं थी

जहाँ हर पल उसके ख्वाब में पलता हैं
वो सूखा पेड़ भी अब गुलमोहर लगता हैं
न जाने वक़्त कैसे बदल गया
मैं चोट खा कर भी संभल गया
ज़िन्दगी इतनी भी हरी नहीं थी
क्योंकि हमे किसी से मुह्हबत नहीं थी

ज़िन्दगी अब फिर से लोरी सुनाती हैं
अनुभव फिर से कहानी बतातें हैं
ये अतीत के झरोखे
फिर से दिल बहलाते हैं
अब हर बात सुन मन खिलता हैं
यूँ एकांकी भी मेरी फितरत नहीं थी
क्योंकि हमे किसी से मुह्हबत नहीं थी

मौसम बदल रहा हैं
कुछ मैं भी बदल रहा हूँ
दिन अब सुहाना लगता हैं
रात भी मतवाली नज़र आती हैं
ये दोपहरी आज से पहले खूबसूरत नहीं थी
क्योंकि हमे किसी से मुह्हबत नहीं थी

शनिवार, 6 अक्टूबर 2012

जवाब ढूँढ लाई हैं

छीन कर ज़माने से
छोटा सा बवाल लाई हैं
ज़िन्दगी मेरे सवालों का
जवाब ढूँढ लाई हैं

वही सादगी वही रवानगी
फिर वही बहार लाई हैं
ज़िन्दगी ....
वही रकीब वही दोस्त
फिर वही प्यार लाई हैं
ज़िन्दगी...

छोड़ कर गम का दामान
ज़िन्दगी मेरे पास आयी हैं
ज़िन्दगी मेरे सवालों का
जवाब ढूँढ  लाई हैं

ऐतबार

खुदा से ऐतबार टूट जायेगा
जब मुझसे कोई बच्चा रूठ जायेगा
उसके चेहेरे की खुशी ही इबादत हैं मेरी
बदले में मंदिरों-मस्जिद छूट जायेगा
चाहो तो देकर देखो उसकी आँखों में आँशु
बद्दुयाओं का साया तुम्हारे पीछे लग जायेगा

रविवार, 9 सितंबर 2012

ये देश

महंगाई बढ़ रहा हैं
गरीब डर रहा हैं
जनता लड़ रहा हैं
माध्यम वर्गी मर रहा हैं
नेता घपला कर रहा हैं
बच्चा ऐसे ही  पल रहा हैं
देश में ऐसा ही  चल रहा हैं
पुलिस डंडा चला रहा हैं
विद्यार्थी हत्कंडा लगा रहा हैं
प्रकृति तबाही दिला रहा हैं
इंसान सजा पा रहा हैं
एक वक़्त हैं
जो चलता जा रहा हैं .....

बोल मेरी माँ कहाँ जाना है तूझे

भटक रहा हूँ जीवन के अँधेरे में
उजाले की ओर लाना है तूझे
बोल मेरी माँ कहाँ जाना है तूझे
ख़तम हो रही है सारी दुनियां मैं सच्चाइया
बढ़ रही है दिशायों में झूठ की परछाइया
सच क्या है झूठ बतलाना हें तूझे
बोल मेरी माँ कहाँ जाना है तूझे
स्वर्ग क्या हें येः मुझको तो मालूम नही
नरक की गहराईया मुझको तो मालूम नही
फर्क क्या हें दोनों मैं बतलाना हाँ तूझे
बोल मेरी माँ कहाँ जाना है तूझे
फासले बढ़ते रहे दो दिलों के बीच मैं
इनसान भी बाँटते गए उंच मैं और नीच मैं
सत्य क्या हें जीवन का बतलाना हें तूझे
बोल मेरी माँ कहाँ जाना है तूझे

शनिवार, 25 अगस्त 2012

उकता गए हैं तुझसे ए ज़िन्दगी

उकता गए हैं तुझसे ए ज़िन्दगी
वाकई में हम
फिजा में रंग नहीं
ज़ीने का ढंग नहीं
भीड़ में धँसता आदमी
दौलत में फंसता आदमी
उकता गए हैं तुझसे ए ज़िन्दगी
वाकई में हम
तपेदिक से मरता हुआ
एड्स से डरता हुआ
सहमा हुआ, डरा हुआ
भक्क सा दिखता  हुआ
उकता गए हैं तुझसे ए ज़िन्दगी
वाकई में हम

शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

पोशीदा से लोग

पोशीदा से लोग
हर वक़्त तकाजे में भिड़े हुए
कुछ उकताए हुए ज़िंदगी से
कुछ कहकहा लगाये हुए
कुछ इशक बाजी  में गुल
कुछ मटरगस्ती में गुल
कुछ बदहवासी में गुम
कुछ तनाव में गुम
पोशीदा से लोग
कुछ पोशीदा से लोग

बुधवार, 2 मई 2012

लोग

क्यों बेखुदी में जिए जातें हैं लोग
जवानी को धुल किए जातें हैं लोग
ज़िन्दगी नासूर हैं मगर फिर भी
मौत से शर्त लागतें हैं लोग
जमीन पर पड़े हैं लड़खड़ाते मगर 
आसमान को ठेंगा दिखातें हैं लोग
सच हैं मुश्किल समझाना इन्हें
जब गर्द चहेरे पर हैं पता हैं सबको
तो क्यों आईने को साफ़ किए जातें हैं लोग

सोमवार, 30 अप्रैल 2012

शराब

एक तवायफ की तरह प्यार जताती हैं शराब
मयखाने में नहीं तो घर में बुलाती हैं शराब
जो रूठ जाओ तो फिर खुद मानती हैं शराब
चिलमन से खुद को छुपाती हैं शराब
इश्क खुदा हैं तो इश्क-ए-जुदाई हैं शराब
मेरे हर गम का अब इलाज हैं शराब
लोग कहतें हैं मुझे छोड़ दो शराब
भला आसानी से कभी छोड़ी जाती हैं शराब

शनिवार, 28 अप्रैल 2012

तुम्हे याद नहीं आती

तुम्हे याद नहीं आती इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं
तनहा हूँ मैं शायद आजकल या मुझे कोई मिलती नहीं

कुछ तर्जुबा तुमको भी हैं ज़िन्दगी का
कुछ तर्जुबा हमको भी हैं ज़िन्दगी का
आओ इन तर्जुबों को मिला ले
फिर तुम भी तजुर्बेकार और हम भी तजुर्बेकार

फकत मजाक की उम्र मैं हम गंभीर रहे
आज हम मजाक में हैं और ज़माना गंभीर हैं

जुलम हो गया मुझसे जुलम होते होते
खुदा कह गया खुद को में रोते रोते

गलती तुम्हारी भी थी और मेरा भी कसूर था
मिल न सके तुमसे हम जाते जाते
हमें क्या पता था येः दुनिया का दस्तूर था






सोमवार, 19 मार्च 2012

काश हमारा भी परिवार होता


काश हमारा भी परिवार होता
जिसे बेइन्तेहाँ हमसे प्यार होता
न खो जातें इस भीड़ में तन्हा अकेले
किसी को तो हमारे आने का इंतज़ार होता
काश हमारा भी परिवार होता.....
निगाहें ढूंढती हर आहट पर हमको
बाप भी दरवाजे पर आँख जमाये होता
कोई गर्म खाना बना कर रखता
कोई साथ खाने को बेक़रार होता
काश हमारा भी परिवार होता.....
किसी से शिकवा किसी से करार होता
तिवारी भी यारों का यार होता
महफ़िलें सजती उन्ही द्वारों में
जहाँ पर अपना परिवार होता
काश ......

बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

तुम्ही संसद में जाते हो

कभी मंदिर गिराते हो
कभी मस्जिद गिराते हो
कभी दंगे कराते हो
कभी तुम घर जलाते हो
कभी अन्दर करते हो
गरीबी तुम बढ़ाते हो
बड़ा अफ़सोस हैं तुम पर
तुम्ही संसद में जाते हो
तुम्ही संसद में जाते हो

लड़ती रही एक लौ

लड़ती रही एक लौ अँधेरे से ये सोच कर की मैं सही हूँ रह रह कर वो देती एक चुनौती और बीच बीच में वो खिड़की के बहार देखती की आ जाये कोई मसीहा हौसल...