शनिवार, 11 जून 2011

मैं और मेरी कमीनी जिंदगी ........

वो मुफलिसी का दौर था 
नियति कही अन्दर गहराई में दफन थी 
कभी कभी दिल बहलाने के लिए
जिन्दगी से गुफ्तगू  किया करता था 
मैं कहता था तारे तोड़ना है.
वो मुस्कुराते हुए कहती
पैसे ही तोड़ लाओ बहुत है 
मैं बेशर्म सा हँस देता था
लेकिन फक्र  भी होता था
बिना जेब वाले कपड़ों को देख कर
फटे नोट को फेक कर मिली
एक मात्र ख़ुशी को 
वो फिर से हाथ में थमा कर छीन लेती थी 
और हँसते हुए कहती लो बीड़ी खरीद लेना 
तब मैं एक बनावटी गुस्सा दिखा कर 
उसके बाल खींचता
वो चीखते हुए कहती 
जेब वाले कपडे कब पहनोगे 
मैं कहता 
जब पैसे  पेड़ पर उगेंगे  
वो कहती बेशर्म कही का 
मैं कहता कमीनी ज़िन्दगी
 











    
 













                   

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