सोमवार, 8 अक्टूबर 2012

क्योंकि हमे किसी से मुह्हबत नहीं थी

जहाँ हर पल उसके ख्वाब में पलता हैं
वो सूखा पेड़ भी अब गुलमोहर लगता हैं
न जाने वक़्त कैसे बदल गया
मैं चोट खा कर भी संभल गया
ज़िन्दगी इतनी भी हरी नहीं थी
क्योंकि हमे किसी से मुह्हबत नहीं थी

ज़िन्दगी अब फिर से लोरी सुनाती हैं
अनुभव फिर से कहानी बतातें हैं
ये अतीत के झरोखे
फिर से दिल बहलाते हैं
अब हर बात सुन मन खिलता हैं
यूँ एकांकी भी मेरी फितरत नहीं थी
क्योंकि हमे किसी से मुह्हबत नहीं थी

मौसम बदल रहा हैं
कुछ मैं भी बदल रहा हूँ
दिन अब सुहाना लगता हैं
रात भी मतवाली नज़र आती हैं
ये दोपहरी आज से पहले खूबसूरत नहीं थी
क्योंकि हमे किसी से मुह्हबत नहीं थी

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