क्यों खुदा अपने बन्दों से मज़ा लेता हैं
जब रहता हैं सगरे-मीना मे,
तो पता क्यों मंदिर मस्जिद का उन्हें देता हैं
वो जान जा रही हैं किसी बेजुबान की
तौहीन हो रही हैं गीता कुरान की
कोई मुझ से भी पूछे शहर का आलम, यहाँ खुले आम होते हैं इस्मत के सौदे.........
मैं बोसा भी लेता हूँ तो लोग मर जातें हैं
कैसा जहर भर दिया तूने मेरे जेहेन मैं
आगे बढ़ा तो मैं अम्बर को खा गया
पीछे मुड़ा जो मैं तो सूरज को खा गया
कहतें हैं अब मुझको बदल गया शामिल
मैं कहता मुझको आज जीना आ गया
मैं खुद नहीं जनता कि क्या चाहता है आदमी
आज आरक्षण तो कल संरक्षण मांगता हैं आदमी
इंसानीयत मर गयी हैं हर बार जाता देता हूँ
जब भी पूछ्तें हैं घरवाले कब आओगे मिलने
तारीख अगले महीने की बता देता हूँ
एहसान तले इतनी दबती हैं ज़िन्दगी
की हर साक्ष एहसान फरामोश हो जाता हैं
मेरे मरने के बाद उनका इकरार आया,
मेरे आखरी हंशी पर उन्हीं प्यार आया
क़यामत की रात वो हमसे मिलने आयी
न वो कुछ कह पाय न हम कुछ कह पाय
वो आँखों हे आँखों में हमारे हो चुके थे
एक हम थे जो कब क सो चुके थे
जब रहता हैं सगरे-मीना मे,
तो पता क्यों मंदिर मस्जिद का उन्हें देता हैं
वो जान जा रही हैं किसी बेजुबान की
तौहीन हो रही हैं गीता कुरान की
कोई मुझ से भी पूछे शहर का आलम, यहाँ खुले आम होते हैं इस्मत के सौदे.........
मैं बोसा भी लेता हूँ तो लोग मर जातें हैं
कैसा जहर भर दिया तूने मेरे जेहेन मैं
आगे बढ़ा तो मैं अम्बर को खा गया
पीछे मुड़ा जो मैं तो सूरज को खा गया
कहतें हैं अब मुझको बदल गया शामिल
मैं कहता मुझको आज जीना आ गया
मैं खुद नहीं जनता कि क्या चाहता है आदमी
आज आरक्षण तो कल संरक्षण मांगता हैं आदमी
इंसानीयत मर गयी हैं हर बार जाता देता हूँ
जब भी पूछ्तें हैं घरवाले कब आओगे मिलने
तारीख अगले महीने की बता देता हूँ
एहसान तले इतनी दबती हैं ज़िन्दगी
की हर साक्ष एहसान फरामोश हो जाता हैं
मेरे मरने के बाद उनका इकरार आया,
मेरे आखरी हंशी पर उन्हीं प्यार आया
क़यामत की रात वो हमसे मिलने आयी
न वो कुछ कह पाय न हम कुछ कह पाय
वो आँखों हे आँखों में हमारे हो चुके थे
एक हम थे जो कब क सो चुके थे
मेरे कल्पनाये हैं कोई भी राय हो तो ज़रूर बताये क्योंकि बिना आलोचनाओं के रचनाओं में सुधार नहीं आता
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