रविवार, 9 सितंबर 2012

बोल मेरी माँ कहाँ जाना है तूझे

भटक रहा हूँ जीवन के अँधेरे में
उजाले की ओर लाना है तूझे
बोल मेरी माँ कहाँ जाना है तूझे
ख़तम हो रही है सारी दुनियां मैं सच्चाइया
बढ़ रही है दिशायों में झूठ की परछाइया
सच क्या है झूठ बतलाना हें तूझे
बोल मेरी माँ कहाँ जाना है तूझे
स्वर्ग क्या हें येः मुझको तो मालूम नही
नरक की गहराईया मुझको तो मालूम नही
फर्क क्या हें दोनों मैं बतलाना हाँ तूझे
बोल मेरी माँ कहाँ जाना है तूझे
फासले बढ़ते रहे दो दिलों के बीच मैं
इनसान भी बाँटते गए उंच मैं और नीच मैं
सत्य क्या हें जीवन का बतलाना हें तूझे
बोल मेरी माँ कहाँ जाना है तूझे

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