कभी दर्द बांटा करते थे आज दर्द की दुकान हो गए हैं
कल तक मालिक थे अपने घर के आज मेहमान हो गए हैं
कल तक मालिक थे अपने घर के आज मेहमान हो गए हैं
लड़ती रही एक लौ अँधेरे से ये सोच कर की मैं सही हूँ रह रह कर वो देती एक चुनौती और बीच बीच में वो खिड़की के बहार देखती की आ जाये कोई मसीहा हौसल...
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