रविवार, 11 नवंबर 2012

भूख

मेरे छोड़े हुए खाने को
वो बच्चा खा रहा था
जीवन का ये भी एक सच हैं
वो मासूमियत से सिखा रहा था
उसके सूखे हुए होठ
पानी की कीमत समझा रहे थे
उसके खाने की रफ़्तार
भोजन की अमूर्तता बता रही थी
मैं खाना अधूरा छोड़ कर
स्वाद से युक्त हो रहा था
वो अधूरा खाना खा कर
अपनी भूख से मुक्त हो रहा था

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