शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

इस जहाँ से बाहर

उसकी मुस्कराहट
मेरे काफिये को पूरा करती थी
उसकी एक झलक
मेरी ग़ज़ल को पूरा करती थी
उसका साथ होना
एहसास था मेरे होने का    
आज एक अजब ख़ामोशी हैं
मेरे काफिये तंग हैं
गजल अधूरी
और मैं अपुर्ण
मुझे पता हैं
अब मेरे काफिये में
कभी वजन नहीं आएगा
मेरे आँखों के सूखे आंशु
कभी बह नहीं पाएंगे
ज़िन्दगी जो आज थम गयी हैं
शायद कभी रफ़्तार में नहीं आएगी
वो आज कहीं चला गया हैं
मुझसे दूर बहुत दूर
और ये सच हैं की
वो फिर कभी नहीं आएगा
उसकी याद और जुस्तुजू ही
अब जीने का सहारा हैं
मुझे उम्मीद की हम
मिलेंगे इस जहाँ के बाहर
जहाँ ज़िन्दगी फिर से
सुरु होगी
जहाँ मेरी गजल
फिर से पूरी होगी
और मेरे काफिये
कभी तंग नहीं होंगे
इस जहाँ से बाहर
इस जहाँ से बाहर

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

लड़ती रही एक लौ

लड़ती रही एक लौ अँधेरे से ये सोच कर की मैं सही हूँ रह रह कर वो देती एक चुनौती और बीच बीच में वो खिड़की के बहार देखती की आ जाये कोई मसीहा हौसल...