ये किसी जाने माने शायर की शायरी नहीं एक नौसिखिये की बकवास है.............
kya khub
लड़ती रही एक लौ अँधेरे से ये सोच कर की मैं सही हूँ रह रह कर वो देती एक चुनौती और बीच बीच में वो खिड़की के बहार देखती की आ जाये कोई मसीहा हौसल...
kya khub
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