शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

एक अरसा हुए मुस्कुरये हुए



एक अरसा हुए मुस्कुराए हुए ,
दर्द को तो हम थे छुपाए हुए |
आँख फौलाद थी,
जिस्म कमज़ोर था,
हौसलों में मगर दम न कमज़ोर था |
बढ़ गए काफिले मंजिलों की तरफ ,
एक में बस ही था जो इस ओर था |
दरद होठों में हो तो कुछ और बात हैं ,
दरद सीने में हो तो मज़ा और हैं,
देश पर मरने वालें तो लाखों मगर ,
जो अमन पर मरे कुछ और लोग हैं |
मकबरे जगमगाएंगे अपने मगर ,
देखने जो मिले तो मज़ा और हैं |

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