सर पर चोट लगने की वजह से मेरे पिताजी की याददाश्त कमज़ोर हो गयी थी डॉक्टर की सलाह से उन्हें दिल्ली लाकर ऑपरेशन करने का विचार था पर पिताजी दिल्ली आने को तैयार नहीं थे बार बार कह रहे थे की कहीं नहीं जाना हैं मुझे मैं अपने बाप के घर को छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा जो इलाज करवाना हैं यहीं करवाओ माँ के बहुत समझाने के बाद वो एक हफ्ते के लिए दिल्ली आने को तैयार हो गयी और कहा की अगर वहां मन नहीं लगा तो दो दिन मैं ही चला आऊंगा उनकी इस बच्चे जैसी बातो को सुनकर सब हंश्ने लगे . अगले दिन तयशुदा वक़्त पर हम दिल्ली चलने को तैयार हुए घर से निकलते ही पिताजी ने कहा अपनी वो काली वाली टी-शर्ट दे पहनने को ये पुरानी शर्ट पहन कर मैं नहीं जाऊंगा मैंने गुस्से मैं देखा मगर उनको कोई फर्क नहीं पड़ा बोले सोच ले बाप चाहिए की शर्ट माँ ने बीच में ही कहाँ की ठीक हैं दे दे इन्हें वो वाली शर्ट इनका भी नौटंकी ना शर्ट पहनती हे उनका चेहरा ख़ुशी से खिल गया जैसे कोई जंग जीत ली हो शर्ट पहनते ही वो एक नवजवान की तरह लगने लगे थे.
बिलासपुर से दिल्ली तक पहुचते पहुचते उनका बुखार कुछ कम ज्यादा होता रहा मगर उन्होंने ज्यादा बात नहीं की बस बीच बीच मैं उठकर स्टेशन आने पर उनका नाम पूछते जातें थे सुबह ७ बजे ट्रेन स्टेशन पर थी पिताजी की तबियत वैसे की वैसे थी ऑटो लेकर हम घर पहुचे पिताजी ने कहा की मैं थक गया हूँ अभी आराम करूंगा कोई उठाना मत हम सब भी थके हुए थे तो आराम करने चले गए २ घंटे बाद जब सबने आँख खोली तो देखा पिताजी गायब हैं , हमने यहाँ वहां देखा मगर वो नहीं दिखे फिर छोटे भाई ने कहा अरे यार उनको तो रोज पीने की आदत हैं इसीलिए निकल गए होंगे मैंने कहा सुबह सुबह हद करतें हैं यार अभी २ घंटे पहले ही तो आए हैं सब ने कहा कोई नहीं आ जाएँगे जैसे जैसे समय बीतता गया उनका कोई पता नहीं चला माँ ने कहा शायद घर वापस चले गए होंगे वैसे भी बोल रहे थे की नहीं रुकुंगा लेकिन बोलकर तो जाना था ऐसे कैसे जा सकतें हैं शाम को घर फ़ोन लगा दिया गया सब परेशान हो रहे थे कोई ये कह रहा था की उनको ऐसे हालत में अकेला नहीं छोड़ना था , लेकिन छोड़ने की बात तो तब थी की जब हमें पता होता की वो भागने वाले हैं वो तो बिना कुछ बोले ही चले गए थे दो दिन हो गए उनका कोई पता नहीं चला अब हर तरफ खबर फैला दी गयी घर बाहर हर कोई परेशान और अंत मैं हार कर हम लोग थाने चले गए गुमशुदा की रिपोर्ट लिखवाने पहली बार मैं थाने जा रहा था वो माहौल मेरे लिए बिलकुल नया था हमने थानेदार से कहा एक ( F.I.R.) लिखवानी हैं गुमशुदा की उसने उपर से नीचे तक मुझे देखा और कहा कौन लापता हैं मैंने कहा मेरे पापा २ दिन से घर नहीं आए हैं उन्ही की रिपोर्ट लिखवानी हैं हंसते हुए उसने कहा पकड़ कर क्यों नहीं रखतें हो अपने माँ बाप को अब कितने लोग यही केस लेकर रोज २ आ जातें हैं जाओ एक कागज मैं अपनी शिकायत लिखकर दे दो हम सील लगाकर दे देंगे मैंने कहाँ इनके बारे मैं जानकारी कब तक मिल जाएगी उसने कहा ज्यादा सवाल न कर छोरे शिकायत लिख दी हैं न अपनी जब मिलेंगे तो हम खुद संपर्क केर लेंगे धन्यवाद कहने के सिवा हमारे पास और कुछ नहीं था.
घर आकर हम सब दोस्त भी अलग अलग दिशाओं में निकल पड़े उन्हें खोजने के लिए साथ मैं उनकी फोटो लेकर दिल्ली ( NCR ) में उनकी खोज जारी रखी जब भी समय मिलता हम आस पास के इलाके में जाकर उनका पता करतें हर स्टेशन बस स्टैंड पर उनकी फोटो लगा रखी थी हमने एक एक दिन काटना हमारे लिए मुश्किल होता जा रहा था इधर माँ का हाल भी रो रो कर बुरा हो रहा था हर बार थाने जाकर अपना सा मुँह लेकर आ जाते थे अब तो थाने वाले भी फटकार लगाने लगे थे की सारी फोर्सं भेज दे तेरे बापू को खोजने में जब मिलेंगे तो बता देंगे एक दो बार तो ऐसे बातें बोली की मत पूछो एक ने कहा हाँ ज़रूर प्रोपर्टी का मामला होगा पता करना होगा की बाप जिंदा हैं की नहीं और अगर मर गया हैं तो हमसे प्रमाणपत्र चाहिए होगा येः बाप का प्यार नहीं प्रोपर्टी का मोह हैं ,मैंने भी चुटकी लेते हुए कहा मेरे बापू बेरोजगार थे और सारी प्रोपर्टी शराब में उड़ा चुके हैं उनके नाम और माँ के सिवा हमारी कोई प्रोपर्टी नहीं हैं माफ़ किजियेगा सर आपको तकलीफ दी अब अपने बापू को खुद ही खोज लेंगे जवाब सुनकर उसने भी अपना मुँह फेर लिया अब तक हमें मालूम चल गया था की थाने वाले सिर्फ खानापूर्ति के लिए काम कर रहे हैं. हमने दुबारा थाने न जाने का फैसला कर लिया और अगले दिन से दुगनी तेजी से अपने पिता को ढूँढने में लग गए इस बार हमने समाचार पत्र में इश्तेहार निकला और मुख्या तौर पर हॉस्पिटल तथा वृधाश्रम में पढताल सुरु की एक बार तो हमे खबर मिली की टगोर गार्डेन के पास एक ६० साल के आदमी की लाश मिली हैं जो की एक काली टी शर्ट पहने हुए था मैंने तुरंत अपने दोस्त को फ़ोन लगाया और उस हॉस्पिटल की तरफ निकल पड़े वहां पहुचते-पहुचते बहुत रात हो चुकी थी मुर्दा घर भी बंद हो चूका था बहुत मानाने पर उसने लाश दिखने की हामी भर दी लेकिन उसने कहा की वो मुर्दा घर के अंदर नहीं जाएगा जैसे ही उसने दरवाजा खोला हमारा कलेजा मुँह में आ गया १०-१५ लाशे वहां रखी हुई थी. उसने कहा की सिनाक्थ करने के बाद मुझे बुला लेना हम दोनों अंधरे में एक एक लाश को पहचानने की कोशिश कर रहे थे.
सब बुरे से बुरे हालत में थी मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे अंततः एक भी लाश की सिनाक्थ नहीं हो सकी हम खुश थे की कम से कम इनमें तो वो नहीं थे मगर दुखी भी थे की उनका अभी तक कोई पता नहीं चला .उसके कुछ दिन बाद हमने ( र.टी.इ ) फाइल किए मगर पिताजी का कहीं कोई पता नहीं चला येः विडम्बना हैं इस देश की .
यहाँ आम आदमी की सुरक्षा और जान की किसी को परवाह नहीं हैं यही हॉल अगर किसी मंत्री का होता तो सब की सब फोर्स लग गयी होती और अब तक वो मिल भी गए होते
इस घटना को एक साल हो गए हैं और अब तक कोई सुराग नहीं मिला हैं अब तो येः विश्वाश करना भी मुस्किल हो गया हैं की वो जिंदा भी हैं की नहीं इस घटना से माँ पूरी तरह टूट गयी हैं और उसने आश्रम जाने का फैसला कर लिया हैं अब वो किसी के साथ रहना नहीं चाहती भाई भी नौकरी के लिए दुसरे शहर चला गया हैं मैं भी किसी तरह अपनी ज़िन्दगी के दिन गिन रहा हूँ कभी कभी माँ से आश्रम में मिलने चला जाता हूँ पिता की याद सबके जेहन से धुन्दली होती जा रही हैं और एक ही बात याद आती हैं पिताजी को लेकर की
" इतना रो चूका हूँ तुजे पाने की कोशिश मैं के अब अगर तू मिल भी जाए तो गम कम न होगा "
और अगर वो वापस आ भी गए तो क्या सब ठीक हो जाएगा..वो अकेले नहीं गए अपने साथ बहुत सारे सवालों के जवाब भी ले गए हैं..इसी उम्मीद में की वो ज़रूर वापस आयेंगे अपने कुछ सवालो और हमारे कुछ जवाबो के साथ .........
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