"ले पढ़ बेहतरीन बुक है "मुझे आकाश ने मक्सिम गोर्की की मेरा बचपन देते हुए कहा.मैंने दो पन्ने पढ़े और उसे वापस देते हुए कहा मेरा भी एक बचपन था.सुन एक बिखरे बचपन की कहानी.वो दिन मेरे लिए लिए कुछ स्पेशल था.पिताजी ने एक मिटटी का गुल्लक मुझे ला कर दिया था.मुझे ये पता नहीं था की पिताजी करते क्या हैं और न ही कभी जानना चाहा.सुबह निकल जाते थे रात को आते थे और सब से पहले मुझे ही खोजते थे। "ये ले तेरा बैंक ,बैंक पता है ना हम सब जहाँ पैसे रखते हैं.उसकी सुरख्छा के लिए"मैं गुल्लक देख कर काफी खुश हुआ .ऐसा ही एक सुमित के पास भी था.जिसे वो पिग्गी बैंक कहता था.हर महीने उसका गुल्लक भर जाता था क्योंकि उसके पिताजी अमीर थे ऐसा माँ कहती थी .तब मैं अमीर को एक जाती या धर्म समझता था .खैर उस दिन के बाद गुल्लक मेरा सबसे प्यारा साथी हो गया मैंने सबसे पहले सुमित के घर जा कर उसे गुल्लक दिखाया."हे हे गधा खाली गुल्लक क्या दिखा रहा है.देख मेले पास तो इतने सारे भरे हुए गुल्लक हैं "सुमित ने मुझे चिढाते हुए कहा.तब मैंने भी ठान ली की एक महीने में अपना गुल्लक भर के उसे दिखाऊंगा |.
"बुआ पैसे दो ना मुझे गुल्लक भरनी है "मैंने प्यार से बुआ को कहा ."ये तुझे किसने ला कर दिया?" बुआ ने पूछा मैंने कहा पिताजी ने ."ओह तो अब इसे भरने के लिए पैसे कहाँ से लाएगा.जा अपने पिता जी से ही भरवा अब गुल्लक " बुआ ने पच्चीस पैसे देते हुए कहा। मैंने वो पच्चीस पैसे प्यार से गुल्लक में डाले और फिर उसे हिला कर पैसे की खनकने की आवाज़ सुनी.और फिर उस पर लिख दिया 'लवी का गुल्लक' वो एक ऐसा एहसास था जो मैं आज भी नहीं भूलता.वो पचीस पैसा मेरे पच्चीस लाख के पैकेज से ज्यादा कीमती था.उस दिन के बाद मुझे पैसे की खनक माँ की लोरियों से भी अच्छी लगने लगी.
"कितना जमा कर लिया लवी" पिता ने शाम को आते ही मुझसे पूछा ' पच्चीस पैसे बुआ ने दिए " मैंने कहा "ये ले एक रुपये मेरी तरफ से " पिता ने गुल्लक की और हाथ बढ़ाते हुए कहा " मैंने कहा नहीं मैं डालूँगा "|
"अच्छा तू ही डाल ले "पिता ने प्यार से सर सहलाते हुए कहा .तुझे पता है ये बहुत कीमती चीज है इसे ऐसे खुले में नहीं रखते जा ऊपर वाले कमरे में छुपा दे ".मैं दौड़कर उसे दादाजी की तस्वीर के पीछे रख दिया.लेकिन मेरा मन नहीं माना मैं कुछ देर बाद उसे फिर नीचे ले आया और उसे फिर हिला कर सिक्कों की आवाज़ सुनी जो की पहले से ज्यादा तेज़ थी.
स्कूल बैग में भी मैंने गुल्लक को डाला "ये क्या कर रहा है "माँ ने पूछा "ये मेरा नया दोस्त है मैं इसे अपने बाकि दोस्तों से स्कूल में मिलवाऊँगा.कुछ पैसे दो ना मम्मी मेरे गुल्लक के लिए " मैंने कहा." पच्चास पैसे तो तू रोज़ लेता ही है टाफी के लिए वही ले ले " मैंने वो पचास पैसे अपने गुल्लक में डाल दिए.
"बुआ पैसे दो ना मुझे गुल्लक भरनी है "मैंने प्यार से बुआ को कहा ."ये तुझे किसने ला कर दिया?" बुआ ने पूछा मैंने कहा पिताजी ने ."ओह तो अब इसे भरने के लिए पैसे कहाँ से लाएगा.जा अपने पिता जी से ही भरवा अब गुल्लक " बुआ ने पच्चीस पैसे देते हुए कहा। मैंने वो पच्चीस पैसे प्यार से गुल्लक में डाले और फिर उसे हिला कर पैसे की खनकने की आवाज़ सुनी.और फिर उस पर लिख दिया 'लवी का गुल्लक' वो एक ऐसा एहसास था जो मैं आज भी नहीं भूलता.वो पचीस पैसा मेरे पच्चीस लाख के पैकेज से ज्यादा कीमती था.उस दिन के बाद मुझे पैसे की खनक माँ की लोरियों से भी अच्छी लगने लगी.
"कितना जमा कर लिया लवी" पिता ने शाम को आते ही मुझसे पूछा ' पच्चीस पैसे बुआ ने दिए " मैंने कहा "ये ले एक रुपये मेरी तरफ से " पिता ने गुल्लक की और हाथ बढ़ाते हुए कहा " मैंने कहा नहीं मैं डालूँगा "|
"अच्छा तू ही डाल ले "पिता ने प्यार से सर सहलाते हुए कहा .तुझे पता है ये बहुत कीमती चीज है इसे ऐसे खुले में नहीं रखते जा ऊपर वाले कमरे में छुपा दे ".मैं दौड़कर उसे दादाजी की तस्वीर के पीछे रख दिया.लेकिन मेरा मन नहीं माना मैं कुछ देर बाद उसे फिर नीचे ले आया और उसे फिर हिला कर सिक्कों की आवाज़ सुनी जो की पहले से ज्यादा तेज़ थी.
स्कूल बैग में भी मैंने गुल्लक को डाला "ये क्या कर रहा है "माँ ने पूछा "ये मेरा नया दोस्त है मैं इसे अपने बाकि दोस्तों से स्कूल में मिलवाऊँगा.कुछ पैसे दो ना मम्मी मेरे गुल्लक के लिए " मैंने कहा." पच्चास पैसे तो तू रोज़ लेता ही है टाफी के लिए वही ले ले " मैंने वो पचास पैसे अपने गुल्लक में डाल दिए.
दिन कब बढ़ने लगे पता ही नहीं चला मेरा गुल्लक भी काफी भरी होने लगा | एक दिन स्कूल की परीक्षा आयी मुझे कुछ दिनों के लिए अपने गुल्लक से दूर जाना था ये सोच कर ही बड़ा अजीब लग रहा था मैंने अपने पिताजी से ये बात बताई तो उन्होंने कहा की हम लोग भी जब बाहर जातें हैं या कुछ दिन के लिए पैसे को कही रहना हो तो उसे किसी बैंक मैं रख देतें हैं वहा पैसा सुरक्षित रहता हैं | पिताजी की बात पर मुझे पूरा विश्वाश था क्योंकि उस समय तक विश्वाश न करना क्या होता है मुझे पता नही था मैंने पूछा की पिताजी मैं कैसे जमा कर सकता हूँ बैंक मैं पैसा वो बोले अभी इसको मरे पास रख दे परीक्षा के बाद तेरा भी खाता खुलवा देंगे मैं बड़ा खुश हुआ की अब मारा भी खाता होगा बैंक मे पिताजी ने कहा की ये ले मरे कमरे की चाभी और अपना गुल्लक वहां पर छुपा दे |
मैं दौड़ता हुआ कमरे में गया और किताबो के पीछे उस गुल्लक को छुपा दिया फिर मैं चला आया परीक्षा की वजह से कुछ दिनों के लिए मेरा नाता उस गुल्लक से छूट गया लेकिन बहुत जल्द ही मेरी परीक्षाएं भी ख़तम हो गयी अब मुझे फिर से अपने गुल्लक का ख्याल आया उस दिन सुबह से ही पिताजी घर पर नहीं थे मेरे आँखें दरवाजे पर नज़र जमाये हुए थी की कब पिताजी आए और मैं कमरे मैं जाकर अपने गुल्लक को ले लूं .उस रात पिताजी शराब पीकर आए पहली बार मुझे समझ में आया की एक सामाजिक इंसान का शराब पीना कितनी बुरा हैं क्योंकि जिस लहजे मैं वो बात कर रहे थे ये मानना बड़ा मुस्किल था की ये वो ही मेरे पिता हैं जो सुबह मुझे ज्ञान की बातें सिखातें हैं खैर जैसे तैसे मैंने उनसे कमरे की चाभी ले और अपने गुल्लक को लेने चल पड़ा पर जैसे हे मैंने दरवाजा खोला मेरे पैरो तले की ज़मीन खिसक गयी मेरा गुल्लक फर्श पर टूटा पड़ा था |
पहली बार मेरे आँखों से झर झर आँशु टपक रहे थे मैं रोता हुआ अपने कमरे मैं गया और जाकर सो गया अगले दिन मुझे उदास देखकर माँ ने पुछा क्या बात हैं मैंने सारी घटना उनको बता दी सुनकर माँ ने कहा तू इतनी बड़ी गलती कैसे कर सकता हैं पहले बताना था न तुझे की तुने गुल्लक वहां रखा हैं रुक मैं पूछती हूँ | सामने से पिताजी हँसतें हुए आ रहे थे जैसे की कोई शातिर बदमाश मुस्कुराता हुआ आता हैं और आते ही उन्होंने कहा की हाँ कल मैंने तेरा गुल्लक तोड़ दिया करीब 40 रूपए थे उसमें जिसकी मैंने शराब पी ली कोई नहीं तेरे लिए नया गुल्लक ले लेंगे रोता क्यों हैं.फिर रख देना मेरे कमरे मैं इतना सुनते ही सब जोर जोर से हंश्ने लगे की और कहने लगे और रख गुल्लक अपने बाप के पास उनकी हंशी जैसे मेरे लिए कटाक्ष से कम नहीं थी मेरे जुबान से एक शब्द भी नहीं निकला मैं समझ गया था की मेरा गुल्लक किसने तोडा हैं कौन है वो कोई और नहीं मेरा अपना बाप हैं उस रात सिर्फ एक गुल्लक ही नहीं टूटा था बल्कि उसके साथ मेरा विश्वाश और भरोसा दोनों टूटा था | एक गुल्लक के टूटने का दर्द सिर्फ वो बच्चा ही समझ सकता हैं जिसने सपने में भी गुल्लक को अपने से दूर नही रखा और एक हवा के झोके के साथ वो सारे सपने बिखर गए हो . इस घटना को आज पूरे २० साल हो गए हैं मगर आज भी उसको याद करने से दिल घबराता हैं | मेरे टूटे हुए गुल्लक के साथ साथ मेरा बचपन भी बिखर गया एक वो दिन था और एक आज का दिन हैं तब से लाकर आज तक मैंने कभी गुल्लक नही रखा .....

Its a painful experience, since the creator is the ultimate destructor in this case. the father is the most confident builder in a childs life and second only to mom. he himself errs in understanding the childs feelings and not respecting...... definitely a childhood 'broken'
जवाब देंहटाएं-- Satish Kotty