मौत सौ शक्लों मैं डराती थी ,
हर शकल को मैंने खुदा मान लिया
अब न मौत मुझको डराती हैं
और न खुदा से मुझको डर लगता हैं
तम्मना यही थी की मौत को हराना था
क्या खबर थी की मुझे खुदा बन जाना था ----shamil
लड़ती रही एक लौ अँधेरे से ये सोच कर की मैं सही हूँ रह रह कर वो देती एक चुनौती और बीच बीच में वो खिड़की के बहार देखती की आ जाये कोई मसीहा हौसल...
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