मंगलवार, 5 जुलाई 2011

मुस्कुराता गम....




उठ गए सब लोग मेरी महफ़िल से 
एक जाम ही था जो साथ निभाता रहा,
बुझा दिया आँधियों ने हर मशाल को
एक जुगनू  था जो रात भर टिमटिमाता रहा
रो गयी खुशिया भी सुन कर दास्ताँ मेरी
एक गम बस ही था जो मुस्कुराता रहा |

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लड़ती रही एक लौ

लड़ती रही एक लौ अँधेरे से ये सोच कर की मैं सही हूँ रह रह कर वो देती एक चुनौती और बीच बीच में वो खिड़की के बहार देखती की आ जाये कोई मसीहा हौसल...