जब फेका था पत्थर उस पर
उसने पलट कर वार नहीं किया
जब सीने से लगाया उसने भी जी भर कर प्यार किया
जहर लेकर मुजसे ज़खीरा अमृत का दिया
सुनकर मेरे सारे रंजो गम
सहारा उसने अपनी बाँहों का दिया
दूर रह कर भी मुजसे अपने
होने का अहसास उसने दिया
कुछ लोग थे उसके खिलाफ
अपनी तरक्की में उसे बाधा समझते थे
मुझे बहला कर खरीद लिया मुझसे
और मेरे सामने ही उसे काटे जा रहे हैं
और मैं बुस्दिलों की तरह उसे कटते हुए देख रहा हूँ
बुधवार, 13 जुलाई 2011
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
लड़ती रही एक लौ
लड़ती रही एक लौ अँधेरे से ये सोच कर की मैं सही हूँ रह रह कर वो देती एक चुनौती और बीच बीच में वो खिड़की के बहार देखती की आ जाये कोई मसीहा हौसल...
-
दो दिन पहले ही मैंने अपनी टिकट करवाई थी | आबू-रोड मे माँ का ऑपरेशन होना था ,आज होली का दिन था १० बज चुके थे मैं निकला स्टेशन क लिए मगर आज...
-
वो मुफलिसी का दौर था नियति कही अन्दर गहराई में दफन थी कभी कभी दिल बहलाने के लिए जिन्दगी से गुफ्तगू किया करता था मैं कहता था तारे तोड़ना ...
-
हमी थे वो शक्श जिसने मंदिर में नमाज पढ़ी थी हमी थे वो शक्श जिसने मज्जिद में पूजा की थी बेशक न रिवाज हो ये दुनिया का जिससे मैं वाकिफ नहीं ...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें