रविवार, 24 जुलाई 2011

खामखाव्ह



मैं यूँ ही निकल गया उसकी ज़िन्दगी से खामखाव्ह
उसने रोका भी नहीं मुझे यूँ ही खामखाव्ह
वो हर शक्ल में शामिल को ढूँढती हैं खामखाव्ह
मैं हर रोज ही सामने से निकल जता हूँ खामखाव्ह
कुछ वो भी जिए जा रही हैं खामखाव्ह
कुछ मैं भी जिए जा रहा हूँ खामखाव्ह

2 टिप्‍पणियां:

लड़ती रही एक लौ

लड़ती रही एक लौ अँधेरे से ये सोच कर की मैं सही हूँ रह रह कर वो देती एक चुनौती और बीच बीच में वो खिड़की के बहार देखती की आ जाये कोई मसीहा हौसल...