गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

आदिवासी नक्सलाइट हो गया

अदि काल से किसी जगह पर रहने वाले को आदिवासी कहा जाता हैं ऐसा मैं बचपन से सुनता आया हूँ
और हम आर्य पुत्र हैं जो की बहार से आये हैं .समय के साथ साथ हमने बहुत विकास कर लिया हैं .मगर विकास की इस दौड़ मैं हम ये भूल गए हैं की जिनको हम विकास के नाम पर अपने साथ दौड़ना चाहते हैं क्या वे भी हमारे साथ इस दौड़ मैं शामिल होना चाहते हैं .हमारे विकास रूपे ढांचे मे हमने इन आदिवासी लोगों के  लिए कोई जगह नहीं बनाई हैं हमारा ढांचा हमारे लोग बस इतना ही .हम उन्हें अपने बनाये  हुए ढांचे में क्यों जोड़ना चाहतें  हैं जब की वे अपनी दुनिया में खुश हैं खेती करना समुदाय मे रहना येः सब वो अदि काल से करते आ रहे हैं क्यों उन्हें हम विकास की दौड़ मैं अपने साथ दौड़ा रहे हैं उनकी ज़मीन छीन कर उनकी सीमा का अतिक्रमण कर इस तरह हम अपने ही  भाइयों को अपने खिलाफ कर रहे हैं आज वो मजबूर होकर बन्दूक उठा रहे हैं जो की इस देश की विडम्बना हैं आज भाई को रोकने के लिए हम दूसरा भाई उसे मारने के लिए भेज रहे हैं अगर इसी तरह चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब हमें अपने ही लोगों से आज़ादी की जंग लड़नी पड़ेगी  और जिस दिन वो गरीब आदिवासी भाई अपना हक मांगने क लिए दिल्ली पहुच गए फिर वो सैलाब आएगा जिसको रोकने क लिए फिर से खून की नदियाँ बहने लगेगी इससे पहले समस्या ज्यादा बड़ी हो जाए हमें मिल कर इसका समाधान निकलना होगा.अन्याय और अत्याचार अगर किसी के ऊपर लगातार होता रहे तो उसे मजबूरन हथियार उठाना पडता हैं बड़े दुःख के साथ कहना पडता हैं की जो आदिवासी कभी किसान हुआ करता था आज वो हैं  नक्सलाइट हो गया हैं .में भी छत्तीसगढ़  का हूँ मगर आज मैं एक तथाकथित सभ्य समाज में रह रहा हूँ जहाँ भ्रस्टाचार  बेमानी अपनी चरम सीमा पर हैं मगर मेरे आँखें बंद हैं मुझे आँख खोलने की भी इजाजत नहीं हैं कितना बेबस हूँ  में अपने परिवार में हो रहे संग्राम को रोकने तक का हक नहीं हैं मेरा  परिवार ख़तम हो रहा हैं लोग मर रहे हैं एक आदिवासी (नस्क्ली) मरता हैं दो पुलिस वाले मरते हैं कुछ गलत हो रहा हैं मेरे मुल्क में इस नफरत के दौर में मेरा दम घुट रहा है काश कोई हो जो मरे इस घुटन को कम कर दे आज कोई मुझे मानवता का दरवाजा दिखा दे ताकि में अपने मुल्क के लिए उससे प्रार्थना कर सकूं --

कोई मिट रह है
कोई जल रह है
किसी को न परवाह
न किसी को यकीन है
ये कैसी फिजा चल रही है

1 टिप्पणी:

लड़ती रही एक लौ

लड़ती रही एक लौ अँधेरे से ये सोच कर की मैं सही हूँ रह रह कर वो देती एक चुनौती और बीच बीच में वो खिड़की के बहार देखती की आ जाये कोई मसीहा हौसल...