शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

मौत


मौत तुझ़े आना हैं, हर दिल का तू फ़साना है
ज़िंदगी है दरबदर मगर तेरा एक ठिकाना है
रूप बदलतें हैं तेरे अनेक
मगर सभी में एक तराना है
कभी धूप कभी छाँव का आना है
मगर तेरा एक निश्चित काल पर आना है
जिस किसी ने ज़िन्दगी को देखा है
वो तेरे वजूद से अंजना है
तेर शकशियत को क्या करूं बयां
तू अपने आप में अफसाना है
मौत तू शायराना है
तुझे एक दिन आना है
मौत से दोस्ती ज़रूरी है
इंसा की बस यही मजबूरी है
आती हैं लम्हों के लिए
और सताती हैं ताउम्र
न ज़िन्दगी से प्यार हैं न मौत से यारी है
क्या बतायें कब किसकी बारी है
ऐ मौत तू एहसान फरामोश मत होना
ज़िन्दगी के साथ तूझ भी गले से लगाया है |

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