भूल चुकी ये दुनिया मुझको,
या मुझको मालूम नही
वक़्त के हांथों की कठपुतली
मैं शायद इंसान नही
भटक रहा हूँ द्वारे-द्वारे
मुझको अब संकोच नही
मंदिर से भी मिली हिराकत
मस्जिद का हाल यही
या अल्लाह अब तो बता दे
क्या तू ही मौजूद नही
वक्त के हांथों की कठपुतली
मैं शायद इंसान नही |
या मुझको मालूम नही
वक़्त के हांथों की कठपुतली
मैं शायद इंसान नही
भटक रहा हूँ द्वारे-द्वारे
मुझको अब संकोच नही
मंदिर से भी मिली हिराकत
मस्जिद का हाल यही
या अल्लाह अब तो बता दे
क्या तू ही मौजूद नही
वक्त के हांथों की कठपुतली
मैं शायद इंसान नही |
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें